________________ श्री ऋषभ श्रीकल्प मुक्तावल्या // 429 // तथा भाद्रपदे मासे, पर्युषणाऽभिधानके, प्रमाणं नाधिको मासो, मुश्च तस्मात्कदाऽग्रहम् // 36 // काकेन भक्षितः किम्बा, तस्मिन् पापं न जायते, बुभुक्षा जायते नो वा, मा हास्यं कुरु भो मुधा // 37 // यतस्त्वमधिके मासे, सति जातेषु वा तथा, त्रयोदशषु मासेषु, क्षामणे ननु वार्षिक // 38 // बारसहं च मासाण, मित्यादि प्रलपन्नपि, नाङ्गीकरोषि किं ब्रूहि, त्वमधिकमासमत्र भोः // 39 // अधिकमाससदभावे, क्षामणे तुर्यमासिके // चउण्डं मासाणमित्यादि / पाक्षिकक्षामणे चैव म-धिकतिथिसम्भवे // 40 // पन्नरसहं दिवसाण, मिति च ब्रूषे / नवकल्पविहारादि, लोककोत्तरकार्यके // आषाढे मासे दुपया" इत्यादि" सूर्याचारे च लोकेऽपि, दीपमालादि१-पर्वसु // 41 // गण्यते नाधिको मासो, धनकलान्तरादिषु, सर्व त्वं किं न जानासि, विद्धि चैवं तथाऽपरम् // 42 // अभिवदितमासोऽन्य, स्तावदास्तां विशेषतः, भाद्रवृद्धावपि त्वाद्य-भाद्रमासोऽप्रमाणकः // 43 // चतुर्दश्यां यथा वृद्धौ, प्रथमामवगण्य च / द्वितीयायाञ्चतुर्दश्यां, पाक्षिकश्च विधीयते // 44 // तथाऽत्रापि परं तर्हि, सति मासेऽप्रमाणके / देवार्चामुनिदानादि-कृत्यमावश्यकन्त्विह // 45 // 1 अक्षयतृतीयाप्रभृतिषु // 2 कृत्यमिति // 42 //