________________ श्री ऋषम arl वज्रस्वामी ततः श्रादैः, श्रीपर्युषणपर्वणि / विज्ञप्तः सोऽपि तानाह, सर्व साधु भविष्यति // 34 // श्रीकल्प ततो माहेश्वरिपुर्या, नभोगामिनिविद्यया / हुताशनाभिद्योद्याने, प्रागमन् वज्रसूरिणः // 35 // मुक्कावल्या तत्पितु मित्रमासीच्च, तत्रत्यो वनपालकः / पुष्पार्थ तं समादिश्य, गतवान् हिमवगिरौ // 36 // // 13 // लक्ष्मीदेवी गृहं रम्यं, महापद्म सकाऽदित, महापद्म तथोद्याना, द्विशलक्षसुमानि च // 37 // आदाय जृम्भकैर्देवैः, पूर्वभवीयमित्रकैः, तदैव सत्त्वरं रम्यं, विमानञ्च विकुर्वितम् // 38 // विमानस्थस्ततः स्वामी, समहोत्सवपूर्वकम्, आगत्य चकृवान् सम्यक्-शासनस्य महोन्नतिम् // 39 // प्रभावं वीक्ष्य तादर्श, राजाऽपि विस्मितोऽभवत्, वज्रस्वामीस्ततः प्रीत्या, श्रावकोऽजनि भावतः॥४०॥ कफोद्रेकस्तदा तेषा-मासीदतिदुखःप्रदः, आनायिता ततः शुण्ठी, स्थापिता कर्णम्लके // 41 // प्रतिक्रमणवेलायां, पतिता सा विलोक्य च, आसन्नतर एवास्ति, मम मृत्यु विचिन्त्य च // 42 // वज्रसेनाभिधंशिष्यमितिवृत्तमबीभणत, भविष्यति च दुर्भिक्षो, द्वादशवत्सरात्मकः // 43 // तथाहि--लक्ष्यमूल्यौदनाद् भिक्षा, प्राप्स्यसि यत्र वासरे, सुभिक्षमवजानीथा, स्तदुत्तरदिनोषसि // 44 // इत्युक्त्वा ज्ञानवान् स्वामी, विजहार ततः सुखम्, स्वपादपद्मरोलम्बैंः, साधुभिः सह पावनैः // 45 // रथावर्तगिरौ यात्वा, गृहीतानशनो दिवं, ययौ स्वामी पवित्रात्मा, दिगन्तख्यातकीर्तिकः // 46 // संहननचतुष्कळच, पूर्व दशमकं तथा, व्युच्छिन्नं स्वर्गते वज्र, विश्वानन्दप्रदायिनि // 47 // 1 लक्ष्मी:-अदित-इति क्रियापदम् // 413 //