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________________ श्री कल्प मुक्तावल्यां श्री ऋषम चरित्रम् // 392 // मन्ये नेमे रपि मुनिमिमं स्थूलभद्रं विशिष्टम् , गत्वा नेमिः शिखरि वरण मोहभूपञ्जिगाय / मोहागारे विकृतिजनके यः प्रवेशम्बिधाय, जित्वा मोहं मृगपतिनिभो यो वशी सन् रराज // 50 // एकदा द्वादशाब्दीयो, दुर्भिक्षः समजायत, तदन्ते सङ्घरोधेन, भद्रवाहु महायमी // 51 // साधूनां शान्तचित्तानां, पञ्चशतीश्च नित्यशः, वाचना सप्तकेनालं, दृष्टिवादमपाठयत् // 52 // महाप्राणाभिधं ध्यानं, साधयन्त स्तदाऽभवन् , श्रीभद्रबाहवो मान्या, स्ततोऽवकासता मनाक // 53 // सप्तभिर्वाचनाभिस्ते, साधवः खिनचेतसः, विजहुश्च ततः स्वैरं, स्थूलभद्रं विना मुनिम् // 54 // महाध्याने समाप्ते च, स्थूलभद्रो निरन्तरम् , वस्तुद्वय प्रहीयां तां, दशपूर्वीमधीतवान् // 55 // भद्रबाहुः कदा स्वामी, पाटलिपुत्रमागतः, तस्थावुद्यानके रम्ये, विनेयगणसेवितः // 56 // बन्दनार्थ न्तदा तत्र, स्थूलभद्रमुनेः शुभाः, भागिन्य वाययुः साध्व्यो, यक्षाद्याः शीलमाधराः // 57 // विधाय वन्दनां भक्त्या, पृष्टः क स्थूलभद्रकः, जीर्णदेवकुले सोस्ति, भद्रवाहु जंगाविति // 58 // आगच्छन्तीश्च ता वीक्ष्य, तासां विस्मथहेतवे, सिंहरूपञ्चकाराशु, स्थूलभद्रो महामुनिः // 59 // पश्चास्यं वीक्ष्य ता भीता, गुरुपार्श्वमुपाययुः, दत्वा विवेकमाहु स्ते, तत्रैवास्ति च गम्यताम् // 60 // 2 गिरिरुपदुर्गम् // 392 //
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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