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________________ कल्पमुक्तावल्यां प्रथम | व्याख्याने दशकल्प अधिकार // 12 // ईर्यापथिकसंज्ञीये प्रतिक्रमणकालके // कायोत्सर्ग चिरन्तेन कृतश्च परिपालितः॥६४॥ पृष्टोऽसा गुरुणा भद्र ? कायोत्सर्गे चिरन्तनम् // चिन्तितङ्किं त्वया ब्रूहि प्रोवाचैषोऽपि तथ्यतः // 65 // जीवदया मया स्वामिश्चिन्तिता कथमुच्यताम् // पृष्टे च गुरुणा पाह-चिन्तितं सरलो मुनिः // 66 // गृहावासे गुरो ? पूर्व क्षेत्रेषु तरु भेदनम् // कृत्वा चोप्तानि भूयांसि धान्यानि चाभवन् भृशम् // 67 // इदानी लघवः पुत्राः सन्ति मे यदि ते तरून् // भेदयन्ति न चेत्तेषां कथं स्याद्धान्यसम्भवः // 68 // ऋजुत्वाच्च गुरोरने स्वाभिमायं न्यवेदयत् // दुर्ध्यातं भवता युक्तं मुनीनां न च बुध्यताम् // 69 // मिथ्या दुष्कृतमेषोऽपि गुरुवाक्यान्तरं ददौ // सत्यमेव ततो वाच्यं गुरो र विशेषतः // 70 // // एवं श्रीवी जनमुनीनामपि वक्रत्वे जडत्वे च दृष्टान्तस्तथाहि // नृत्यन्तं नटमालोक्य श्रीवीर प्रभु साधवः // चिरेण गुरुपादान्ते चाययुः पृष्टवान्-गुरुः // 71 // क स्थिता नटलीलायामुक्ते तैश्च निषेधिताः // नृत्यन्तीञ्च नटीम्भूयो विलोक्या जग्मुरन्तिके // 72 // पृष्टास्ते गुरुणा शिष्या वक्रेणोत्तरमाददुः // वाहं पृष्टाः पुनः सत्यं मोचुस्ते यमिन स्तदा // 73 // उपालम्भे तदा दत्ते गुरुणा ते रहो तथा // गुरो रेव च दत्तोऽसा वक्रबुद्धिविभावितैः // 74 // नटनिषेधकाले भो निषिद्धा न नटी कथम् // भवत एव दोषोऽयं न चास्माकगुरो ? तनुः // 75 // // 12 //
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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