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________________ श्री कल्पमुक्तावल्या (W श्री ऋषम चरित्रम् // 38 // उपसर्गहरं स्तोत्रं, कृत्वाऽऽशुगुरुभिस्ततः, निवारिता महाप्रज्ञैः, प्रज्ञा साधयते न किम् // 22 // उक्तं च-उवसग्गहरं थुत्तं, काऊणं जेण सङ्घकल्याणम् , करुणापरेण विहिअं, सभद्रबाहु गुरुजयतु // 1 // नानोपसर्गहरमत्रविधाय भद्रः, स्तोत्रश्चमत्कृतिपरं करूणापयोधिःयः सङ्गभद्रमकरोद्विविधागमज्ञः, सोऽयंहिताय जयतादगुरु भद्रवाहुः // 23 // मू-पा-थेरस्स णं अज्जसंभूइविजयस्स माढरसगुत्तस्स अंतेवासी थेरे अज्जथूलभद्दे गोयमसगुत्ते-- व्याख्या-स्थविरस्यार्यसम्भूतिविजयस्य माढरगोत्रस्य शिष्यः स्थविरआर्यस्थूलभद्रोगौतमगोत्रोऽभूत्-तत्सम्बन्धश्चेत्थम्-आसोन्मान्यो नन्दराजः, पाटलीतिपुरान्तरे, सचिवः सकटालोऽस्य, स्थूलभद्रस्तदङ्गजः // 24 // द्वादशाब्दानि यो गेहे, कोशायाः स्थितवान् सुधीः, भुञ्जानो विविधान् भोगां-स्तया साकमखण्डितम् // 25 // वररुचिप्रयोगेण, शकटाले मृते सति, आहूय नन्दराजेन, प्रार्थितोऽमात्यहेतवे // 26 // पितृमृत्यु परञ्चित्ते, चिन्तयित्वा महाशयः, अस्वीकृत्य वचस्तस्य, परिव्रज्यां ललौ सुखम् // 27 // अङ्गीकृत्य व्रतान्येष, सम्भूतिविजयान्तिके, कोशागारमलचक्रे, चातुर्मासे तदाज्ञया // 28 // दर्शयन्ती बहून् भावान् , स्मेरहास्यकटाक्षकैः प्रतिबोध्य परं धीर स्ताङ्गुरुपाश्चमागतः // 29 // अनङ्गवाणजेतारं, दृष्टवा तङ्गुरवो जगुः, समक्षं सङ्घदेवस्य, दुष्कर दुष्कराकरः // 30 // मुनित्रयी परं दूना, पूर्वायाता च तगिरा, सिंहभौजङ्ग कूपानां, दरीरन्धैधवासिनी // 31 // // 38 //
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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