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________________ कल्पमुक्कावल्यां प्रथम til व्याख्याने दशकल्प अधिकारः द्वाविंशति जिनेन्द्राणां, तीर्थे यं साधुकादिकम् / उद्दिश्य क्रियते वस्तु, तस्याकल्प्यश्चंतद्-ध्रुवम् // 12 // अन्येषाङ्किलसाधूनामार्याणाश्च तथैव च / कल्पते रेकणं' तत्र, न विधेयङ्कदाचन // 13 // // अथ तृतीयकल्पमाह // सिज्जायत्ति साधवो वाऽथ साध्व्यश्च, वसन्ति यत्र धामनि / शय्यातरश्च विज्ञेयो, तद्धामाधिप एव च // 14 // सम्पूर्णजिनतीर्थेषु, द्वादशभेदरूपकः / सर्वेषामपि साधनां, तस्य पिण्डो न कल्पते // 15 // // द्वादशमेदाश्च इत्थम् // . अशन 1 पान 2 खादिम 3 स्वादिम 4 वस्त्र 5 पात्र 6 कम्बल 7 रजोहरण 8 सूची 9 पिष्पलक 10 नखरदन 11 कर्णशोधन १२-पिष्पलक इति.अस्तर. इति. लोक भाषायाम् // नखरदन इति. नखोत्तारणशस्त्रम् // तद्ग्रहणे दोषानाह॥ अनेषणीयप्रासङ्ग, स्थान दुर्लभतादयः / समुद्भवन्ति वै दोषाः, साधूनां शिवकांक्षिणाम् // 14 // स्थानदोऽशनपानादि, दाता यत्र पुरादिषु / एक एव भवेत्तस्य, गेहेऽयङ्कल्प उच्यते // 15 // समग्रनक्तपर्यन्तं, मुनय स्तस्य समनि / जाग्रति कुर्वते प्रातश्चान्यत्र प्रतिक्रामणम् // 16 // मूलस्थानाधिपो नैव, शय्यातरो विजायते / कल्पते तस्य गेहस्य, साधूनामशनादिकम् // 17 // मुनिमिः शयनं तत्र, सुखेन विहितं यदि / प्रतिक्रमणमन्यत्र, चोभौ शय्यातरौ स्मृतौ // 18 // 1 "संदेहः" // 6 //
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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