________________ श्रो कल्पमुक्तावल्यां // 320 // श्री नेमिनाथ चरित्रम् इतश्च-हल्ली सहिओ! कि मे, दाहिणं चक्ख परिप्फुरइत्ति // इति वदन्ती राजीमती प्रतिसख्यौ॥ __ सख्यौ हले मे स्फुरति त्विदानी, वामेतरञ्चक्षुरनिष्टवेदि // ताम्चतु स्तेऽहित माहतं स्या-दुक्त्वेति थुत्कारमम् विधत्तः // 8 // इतश्चभगवानेमिः. सारथिं प्राह सत्वरम, निवर्तय रथं भद्र ? न मन्ये पाणिपीडनम // 8 // ॥अत्रान्तरे। भगवन्तं निवेक्ष्यैको, हरिणो विश्ववल्लभम् , पिधाय ग्रीवया स्वस्य, मृगीग्रीवां स्थितस्ततः // 82 // अत्र कवि घटना // स्वामिनं वीक्ष्य हरिणोक्ति। मा पहरसु मा पहरसु, एवं मह हिअयहारिणि, हरिणि सामी! अम्हें मरणावि. दस्सहो पियतमाविरहो // 1 // छाया।। प्राणप्रियायां मम वल्लभायां, स्वामिन्नमुष्यां कुरु मा प्रहारम् , अस्माकमस्या विरहः क्षितीश ! प्राणप्रणाशादपि दुःस्सहोऽस्ति // 83 // ॥श्रीनेमिवदनमालोक्य मृगी मृग प्रत्याह // एसो पसन्नवयणो, तिहुअणसामी अकारणं बंधू , ता विण्णावेसु वल्लह! रक्खत्थं सव्वजीवाणं // 2 // ॥छाया।। पूर्णेन्दुवक्त्रो जगतीत्रयीशो, निर्हेतुबन्धुस्त्वयमस्ति नाथ / . अग्रे ततोऽस्याखिलजीवराशे, विज्ञापनां त्वङ्करू रक्षणार्थम् // 84 // // प्रियाप्रेरितो मृगो भगवन्तं ब्रूत्ते // // 320 //