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________________ श्रो कल्प मुक्तावल्या // 30 // पार्श्वनाथ चरित्रम् Dai पञ्चाग्निपूर्वादिलपोऽनुयायी, जातस्ततोऽसौ जटिलस्तपस्वी // सोऽयम्पुरः साम्प्रतमागतोऽस्त्रि, बाह्येऽचितुं तञ्जनता प्रयाति // 7 // पार्श्वप्नभुश्चापि निशम्य द्रष्टुं, सत्रानुसैस्तत्र ययौ समुत्कः // काष्ठान्तराले फणिनं दहन्तं ज्ञानेन विज्ञाय दयापयोधिः // 8 // उवाच रे मूढः ! मुधा तपस्विन् , दयाम्विना किङ्करुषेऽतिकष्टम् // फलं यदीयं द्वयसौख्यमूलं, तसः स्वदेव स्पृहणीयमत्र // 9 // // यतः॥ कुमामदीमहातीरे, सर्व धर्मा स्तृणाङ्कराः। तस्यां शोषसमेत्तायां, कियानन्दन्ति ते चिरम् // 1 // आकर्ण्य कोपी कमठ स्तमस्वी, तम्प्राइ रे राजसुताः प्रवीणाः // इभाश्वलीलादिषु सम्भवन्ति जानीमहे. धर्ममलं बयञ्च // 10 // ततोऽग्निकुण्डात्मभुपार्श्वनाथो, ज्वलन्तमाकृष्य च कारखण्डम् // द्विधा कुठारेण च कारयित्वा, न्यकासयजिह्मगमग्नितप्तम् // 11 // श्रीपार्श्वनिदिष्टनरास्यतोऽसौ, श्रुत्वा नमस्कारमहेऽप्येमन्त्रम् // ख्यानश्च मृत्वा भुज़गाधिनाथो, जज्ञे प्रतापी धरणेन्द्रसज्ञः // 12 // // 30 //
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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