________________ श्रीकल्पमुक्तावा प्रभुचरित्रवर्णनम् // 29 // सम्पूर्णनरक्षेत्रस्थ, सज्ञिपञ्चाक्षदेहिनाम् , मनोगतं विजानन्ति-ऋजुधियो घटादिकम् // 4 // 142 // ___ मू. पा. समणस्स णं भगवओ महावीरस्स चत्तारि सयावाईणं सदेव मणुयाऽसुराए परिसाए वाए अपराजियाणं उक्कोसिया वाइसंपया हुत्था // 143 // व्याख्या-श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य चत्वारि शतानि वादिमुनीनां कीदृशानां देवमनुष्यासुरसहितायां पर्षदि वादे अपराजितानां उत्कृष्टा एतावती वादिसम्पदा अभवत् // 143 // म. पा. समणस्स भगवओ महावीरस्स सत्त अंतेवासिसयाई सिद्धाई जाब सव्वदुक्खप्पहीणाई चउद्दश उज्जियासयाई सिद्धाई // 144 // ... व्याख्या--श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य सप्तशिष्यशतानि सिद्धिं गतानि यावत्सर्वदुःखप्रक्षीणानि चतुदेशआर्यिकाशतानि सिद्धौ गतानि // 14 // मू. पा. समणस्स भगवओ महावीरस्स अहसया अणुत्तरोववाइयाणं गइकल्लाणाणं ठिइकल्लाणाणं आगमेसिभदाण उक्कोसिया अणुत्तरोववाइयाणं संपया हुत्था // 145 // व्याख्या-श्रमणस्य भगवतो महावीरस्य-अष्टशतानि-अनुत्तरोपपातिकानां अनुत्तरविमानोत्पन्नमुनीनां कीदृशानां गतिकल्याणानाम् अर्थात् गतौ-आगामिन्यां मनुष्यगतौ कल्याणं मोक्षप्राप्तिलक्षणं येषां तेषां गतिकल्याणानाम्-पुन कीदृशानां स्थितिकल्याणानां अर्थात् तत्र स्थितिशब्देन देवभव स्तत्र देवभवे कल्याणं / // 290 //