________________ गणघरवाद: श्रीकल्पमुक्कावल्या // 28 // (द्रुतविल) अयि प्रभो ? बत वीरजिनेश्वर !, निखिलदेहितमोहर भास्कर ! किमधुना त्वयका चरणाश्रित, स्त्वयमहो नितमां विरहीकृतः // 6 // अयमहङ्किसु वा बत गौतमो, हतविधि श्वरमे तव दर्शनात् / विमलज्ञानप्रदाद्विमुखोऽ भवं, यदिहमाश्च विहाय ययौ प्रभुः // 7 // निखिलविश्व प्रकाशक, भो जिन !, कथमिमश्चरणाश्रित पट्पदम् / इह विहाय विदुरगतं ययौ, विमलज्ञानप्रभा विगतान्तरम् // 8 // शिशु रिवैष विभो तबकाञ्चले, झटिति नाथ विलग्य च याचनाम् / समकरिष्यदलङ्कलकेवल, स्यवर भागकृते पतितः पुरः // 9 // अमृतधाम्नि प्रभो किमु वा मया, समभविष्यदहो किल कीर्णता / तव च वाऽथ विभो बहुभारता, यदिह माश्च विहाय गतः स्वयम् // 10 // तदनु वीर विभो ? भुवि वीर भो, विदधतोऽतिविलापमनारतम्, प्रवर गौतमवक्त्रसरोजके, समतिशोभत वीपदमेव च // 12 // अवगतं मयका ननु वाऽधुना, जिनवरा हि भवन्ति विहार्दकाः इयमहो मम वाऽत्यपराधता, श्रुतपथो नहि येन विचारितः // 13 // // 28 // 1. निस्नेहाः