________________ श्रीकल्पमुक्तावल्या // 24 // प्रभुउपसवाधिकार शिरसि रुरुहुः केशाः, शृङ्खला नुपूराणि च, वस्त्राभूषणे देव-भूषिता परमोत्तमैः // 513 // .. दुन्दुभिध्वानमाकर्ण्य, शतानीक महीपतिः, राज्ञी मृगावती चैव-ञ्चाययु स्तत्र चेतरे // 514 // महानन्दो महाहर्ष-स्तदाऽजनि तत्र च मातृस्वसमृगावत्या, मिलनं वल्गुचाभवत् // 515 // बसुधारां शतानीको, ग्रहीतु मुद्यतोऽभवत् / शक्रेन्द्रश्च ततः प्राह, शृणु राजंश्च चन्दना // 515 // यस्य दास्यति तस्यैव, धनमेतद्धि नीतितः / तद्धनं श्रेष्टिने दत्त, मिन्द्रेण चन्दनाज्ञया // 516 // वीरस्य प्रथमा साध्वी, चन्दनेयम्भविष्यति / इत्युक्त्वा पुरतः शक्रः, सर्वेषाञ्च तिरोदधे // 517 // शतानिको नृपः कन्याश्च-न्दना मादरात्ततः / नीत्वा समनि कन्यानां, स्थापिताऽन्तःपुरे सुखम् // 518 // विहरंश्च प्रभुर्यातो, ग्रामसुमङ्गलाभिधम् / सनत्कुमारनामेन्द्र, ववन्दे तत्र तीर्थपम् // 519 // ततो विहृत्य चम्पायां, भगवान् समवासरत् / स्वातिदत्त द्विजस्याज्ञि-होत्रशाले वरे तपः // 520 // स्वीकृत्य तुर्य मार्गस्थ, चातुर्मास मथाकरोत् / प्रत्यहं तत्र यक्षौ द्वौ, भद्राग्रपूर्णमाणिकौ // 521 // शुश्रषां स्वामिनोऽकाटी मागत्य, निशि भक्तितः विहृत्य च ततः स्वामी, जृम्मिकाग्राममाश्रयत् // 522 // दर्शयामास शक्रेन्द्रो, नाटयलीलाम्प्रभोः पुरः, इयद्भिर्वासरैः स्वामिञ् ज्ञानमुत्पत्स्यते तव // 523 // उक्त्वेति वन्दनाङ्कृत्वा, ययौ शक्रो निजाश्रयम् / विहृत्य मेण्ढिकाग्राम, ययौ स्वामी ततः सुखम् // 524 // आगत्य चमरेन्द्रोऽत्र, ववन्दे पृष्टवान्. प्रियम् / विहृत्य च ततः स्वामी, ग्रामे षण्नाभिसंज्ञके // 525 // ययौ तस्य वहिर्भागे, स्थितः प्रतिमया ततः / तत्र गोपौ वृषौ मुक्त्वा, ययौ ग्राममशङ्कितः // 526 // // 240: //