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________________ श्रीकल्पमुक्कावल्या प्रभुउपसशर्माधिकार // 233 / / धन्य स्त्वञ्जगतीनाथः, सोढवान् यो वचःपरान् , उपसर्गान् समभावेन, दुष्टकृताननेकशः // 410 // अचिरादेव ते नाथ ?, केवलज्ञानमुज्ज्वलम् , उत्पत्स्यते स्तुतिकृत्वा, ययौ सोऽपि निजालयम् // 411 // श्रावस्ती समलचके, वर्धमान प्रभु स्ततः, तपोभि देशमं तत्र, चातुर्मासमलंव्यधात् // 412 // पारणाश्च बहिः कृत्वा, दृढभूमि ययौ प्रभुः, असुरैरिव या म्लेच्छैः, परिवृता समन्ततः // 413 // तद्वहिमपेढाला-चैत्ये पोलास संज्ञके, अष्टमभक्तकेनैक, रात्रिकी प्रतिमां स्थितः // 414 // तदानीमेव देवेन्द्रो, ज्ञात्वा चावधिना प्रभुम् , सिंहासनात्समुत्तीर्य, ववन्दे ध्यानसंस्थितम् // 415 // प्रशंसातत्परोऽवादी-त्सभायां देवराडिति, अमराणां पुरः प्रीत्या, प्रभुधैर्य गुणोच्चयम् // 416 // ध्यानमग्नस्य शान्तस्य, निश्चलं निर्मलं परम् , प्रभोः कम्पयितुम्चेतो, न शाक्ता स्त्रिजगज्जनाः // 417 // अहो धैर्यमहो शीलं, गाम्भीर्य वचनाऽतिगम , अहो ध्यान महो ज्ञान, स्वामिनः केन वर्ण्यते // 418 // भारतीममरेशस्य, श्रुत्वाऽभिमानसागरः, सामानिकः सङ्गमाख्य, उक्तवानिति निजेरः // 419 / / चालयाम्यधुना शक्र?, मानवन्तं क्षणादहम् , कुतसन्धस्त्वराऽऽगत्य, स्वामिनोऽभ्यणमेष वै // 420 // साहाय्ये नापरस्यात्र, तपः कुर्वन्ति तीर्थपाः, एतस्मात्परिवादत्वा-दिन्द्रेणैष न वारितः // 421 // धूलिवृष्टिश्चकारादा-वदृश्यरविमण्डलम् , यत्पूर्णकर्णनेत्रास्यो, निरुवासोऽभवत्प्रभुः // 422 // धूलिवृष्टया स्थिरं वीक्ष्य, प्रमुं प्रवृद्धमन्युना, उत्पादिता असङ्ख्याता, वज्रमुख्यो हि कीटिकाः // 423 // सचिभिरिव विद्धाङ्ग, स्ताभि वीरजिनेश्वरः, चालनीसमतां दधे, ध्यानानन्दलसन्मनाः // 424 // // 23 //
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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