________________ श्रीकलामुक्कावल्या प्रभुउपसगर्माधिकार // 219 // मुदिताभ्यां तत स्ताभ्यां, तयो द्वौ चालवार्षभौ, अनिच्छतो परं दत्तौ, समानवयसौ वरौ // 213 // श्रेष्ठिगेहे बलाद्वध्वा, तौ गतौ स्वगृहं ततः, व्यवहारी तदा दध्यो, यदीमौ प्रेष्यते ततः // 214 // पण्डीकरणभाराद्यै-दुखिनौ च भविष्यतः, तिष्ठतां सुखिनौ तस्मा-दत्रैव वृषभाविमौ // 215 / / प्रासुकतृणनीराद्यैः, पोष्यमाणौ निरन्तरम्, श्रमादिरहितौ तत्र, तिष्टतो वृषभौ सुखम् // 216 // पर्वसु पौषधस्थेन, जिनदासेन पुस्तकम् , वाच्यमानं निशम्यैतौ, जातौभद्रस्वभाविनौ // 217 / / उपवासं करोत्येष, जिनदासो यदा कदा, तावपि नैव भुञ्जाते, तृणादि शुचिमानसौ // 218 / / भाण्डीरवनयक्षस्य, कदा यात्रोत्सवो महान् , चागत स्तरुणैः स्वीया, योजिता शाकटी तदा // 219 // जिनदासवयस्योऽपि, दृष्टवा तौ बलिनौ वृषौ, अनापृच्छयैव यात्रोत्को, निन्ये तो सुखजीविनौ // 220 // अनादृष्टधुरौ तौ च, कोमलौ वाहिती बलात् , अनभ्यासाच तो जातो, त्रुटितस्कन्धभागको // 221 // जिनदासवयस्योऽपि, यात्राकार्य विधाय च, तद्गेहे वृषभौ बद्धवा निजागारमशिश्रियत् // 222 // तदवस्थौ च तो ज्ञात्वा, जिनदासोऽपि धार्मिकः, चक्रे भक्तप्रतिख्यानं, साश्रुनेत्रो दयान्वितः॥२२३॥ नमस्कारमहामन्त्रं, श्रावयामास कर्णयोः, धर्मक्रियादिभिश्चैवं, निर्यामणमचीकरत् // 224 // मृत्वा तौ च ततो जातौ, नागकुमारदेवकी, उत्तमैः संह संसर्गा-दुत्तमैव गति भवेत् // 225 // नूतनोत्पन्नदेवौ तौ, ज्ञात्वा चावधिना ततः, उपसर्गम्प्रभो स्तत्र, प्रागतौ तूर्णमेव च // 226 // iાર