________________ श्री कल्पमुकावल्यां शकेन्द्रकृत जन्माभिवेकाधिकार // 159 // वैबुध्यमेषां सफलत्वमार्च्छत् ,स्नानञ्जिनस्याचरतां सुनीरैः // माल्यं निधायाङ्गमथामराणा, जातम्पवित्रं सुकृतौघभाजाम // 67 / / उन्मृज्य देहं सुतरां सुरेन्द्रो, गन्धादिकाषायवराम्बरेण // सच्चन्दनैश्चर्चितमङ्गमेव, छकृत्वा प्रसनैजिनदेवमार्चत् // 68 // अग्रे प्रभो रत्नमयेऽच्छपाटे, रूप्याक्षतैरष्टकमङ्गलानि // आलिख्य भावाच्च मनो मुदन्ति, प्रातुष्टुवत्तीर्थपमेवमिन्द्रः // 69 / / // तत्राष्ट मङ्गलानि चेत्थम् // दर्पणो१ वर्द्धमानश्च,२ कलशो३ मीनयोर्युगम्४ श्रीवत्सः५ स्वस्तिको नन्द्यावर्त्त७ भद्रासने८ इति // 1 // स्तुतिः-अट्ठसयविसुद्धगंथजुत्तेहिं महावित्तेहिं अपुणरुत्तेहि अत्थजुत्तेहिं संथुणइत्ता वामं जाणुं जाव एवं वयासी-णमोऽत्थु ते सिद्धबुद्धणीरस्य समणसामाहिअ समत्तसमजोगि सल्लगत्तण णिम्भय वीरागदोस णिम्ममणीसंग निस्सल्लमाणमूरणगुणरयण-सील सागरमणन्तमप्पमेय भविअधम्मवरचाउरन्तचक्कवट्टी / णमोऽत्थु ते अरहो / हे ईश ! ईशेश ! महामहेश !, त्यक्ताखिलैश्वर्यजगज्जनेश // शान्तोऽसि-मुक्तोऽसि-गतारिकोऽसि, तुभ्यं नमो नाथ नमस्त्रिधा मे // 7 //