________________ श्री कल्पमु कावल्यां // 17 // षट्पश्चाशत् दिक कुमारीकृत महोत्सव श्री महावीरप्रभुजन्मसमये-कम्पितासनाः षट्पञ्चाशददिक्कुमार्यः-अवधिज्ञानेन-श्रीमदहज्जन्मज्ञात्वा सहर्ष सूतिकागृहमलञ्चक्रुः–आजग्मुरिति तासां मध्ये-यथा ____ भोगङ्करा 1 भोगवती 2 सुभोगा 3 भोगमालिनी 4 सुवत्सा 5 वत्समित्रा च 6 पुष्पमाला 7 त्वनिन्दिता 8 // 1 // तथा रूपा 1 रूपासिका 2 सुरूपा 3 रूपकावती 4-56 एता श्चतस्रो दिककुमार्यों रूचकद्वीपगिरेः सकासादागत्य नमस्कृत्य तत्र भगवतश्चतुरङ्गुलपरमितं नालं छित्वा खाते (गर्ने) निक्षिप्य तथा तद्गत वैडूर्यरत्नैः परिपूर्य तदुपरि पीठं रचयामासुः--तथा दूर्वाङ्कुरैश्च बबन्धुः-इति // 56 // षट्पश्चाशदिक्कुमाय: // अधुना तासां कर्त्तव्यम्वर्ण्यते // ततः कुमार्यः प्रभुजन्मगेहात् , प्राचीप्रतीच्युत्तरदिग्विभागे // गृहाणि रम्याणि विलक्षणानि, त्रीणि व्यधुः शङ्कदलीमयानि // 1 // सिंहासने याम्यगृहे प्रभुन्ता-स्तन्मातरश्चापि सुखं निधाय // सौगन्धतैलेन तयोः पुरस्ता-दभ्यङ्गमच्छा विदधुः कुमार्यः // 2 // // 147.