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________________ कल्पमु त्रिशला कावल्यां // 136 // मातुः प्रमोदाय मयाऽन्वकारि, निष्पन्दभावो बत खेददोऽभूत् // ____ मन्ये ततो लक्षगमेतदेव, संसूचकम्भावि कलेनितान्तम् // 2 // यस्माद् गुणः सोऽपि च पश्चमारे, भविष्यति मत्युत दोषकारी // न्यस्तो यथा वारिणि नालिकेर-स्यात्मपणाशाय भवेच्च चन्द्र॥३॥ इत्थं स भगवान् महावीर:-मातुः 1 इम-पतपं आत्मविषयं प्रार्थितं मनोगतम् सकल्पं समुत्पन्नं अवधिना विज्ञाय मूलपाठः-एगदेसे णं एयइ / तए णं सा तिसला खत्तियाणी हठ-तुट्ठ जाव हियया एवं वयासी // 93 // व्याख्या-एकदेशेन-अर्थात्-अगुल्यादि सञ्चालनेन एजते कम्पते ततः कम्पनान्तरम् सा पूर्णभाग्यवती त्रिशला क्षत्रियाणी हृष्टतुष्टादि परिपूर्णहृदया सती एवम् अवादीत् // 93 // मूलपाठः-नो खलु मे गम्भे हडे, जाव नो गलिए / एष मे गम्भे पुचि नो एयइ-इयाणिं एयइ त्ति कटु हट-तुट्ट जाव हियया एव वा विहरइ। // व्याख्या // किमवादीत् इत्याह नैव मे गर्मो हृतोऽस्ति इति मे निश्चयः-यावत्-नैव गलितश्च एव मे गर्भः पूर्व कम्पमानो नाऽभूत् इदानीन्तु कम्पत एव इति कृत्वा हर्षपूर्णहृदया सती सुखं यथा स्यात् तथा विहरति // // हर्षिता सती यथा त्रिशलादेवी चेष्टामकरोत्तथा कथ्यते // 1 कर्पूरः
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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