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________________ श्री कल्पमुक्तावल्यां चतुर्दशस्व. नाधिकार // 93 // महीतलप्रतिष्ठितमपि गगनमण्डलान्तं भासयन्तम् गगनशिखरमपि स्वदीमा शोभयन्तमिति पुन स्तुङ्गमतएव मेरुगिरिसदृशमीदृशरत्ननिकरराशिं सा प्रेक्षते // 13-45 // मूलपाठः-सिहिं च सा विउलुज्जलपिंगलमहुघयपरिसिच्चमाणनिध्धूम धगधगाइयजलंतजालुज़्जलाभिरामं, तरतमजोगजुत्तेहिं जालपयरेहिं अन्ननमिव अणुप्पइन्नं पिच्छइ सा जालुज़्जलणग अंबरं व कत्थइ पयंतं अइवेगचंचलं सिहि // 14-16 // // व्याख्या // ततो रत्नराशि दर्शनान्तरं सा त्रिशला क्षत्रियाणी चतुर्दशे स्वप्ने ईदृशम् शिखिनम् अग्निम् पश्यति किम्भूतम् विपुलोज्ज्वलपिंगलमधुघृतपरिषिच्यमान निधूमधगधगेतिज्वलज्ज्वालोज्ज्वलाभिरामम् अर्थात् प्रभूतोज्ज्वलघृतेन प्रभूत पिङ्गल मधुना च परिषिच्यमाना-अतएव धूमरहिता दीप्यमाना या ज्वाला स्तामिः सुन्दर मिति पुनरन्योऽन्यम् मिथोऽनुप्रकीर्णमिवासनेनिखिला अपि ज्वालाः परस्परं प्रविष्टा इव सन्तीति दृश्यन्ते कैरित्याह ज्वालाप्रकरै ज्वाला संमूहैः कीदृशैस्तरतमयोगयुक्तै-र्मन्ये परस्परस्पर्धामि न्यूनाधिकारयुक्तैः पुनः क्वचित्प्रदेशे अम्बरम् आकाशं पचन्तमिव केन ज्वालोज्ज्वलनकेन ऊर्ध्वङ्गतयाज्वालयेति अतएवातिवेगचञ्चलम् इत्थम्भूतमरिन सा पश्यति // 14 // 46 // मूलपाठः-इमे एयारिसे सुभे सोमे पिय दंसणे सुरुवे सुमिगे दट्टण सयणमज्झे पडिबुद्धा। अरविंद लोयणा, हरिसपुलइअंगी, एए चउदस सुविणे सव्वा पासेइ तित्थयरमाया / जं रयणि वक्कमई कुच्छिसि महायसो अरहा / / 1 // 47 // // 93 //
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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