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________________ श्री कल्पमु क्तावल्यां चतुर्दशस्वनाधिकारः // 87 // पुनरुदयास्तसमये मुहूर्त सुखदर्शनीयम् पुनरन्यस्मिन् काले दुनिरीक्ष्यरूपं पुना रात्री-उद्धतदुष्प्रचारप्रमादकम् अर्थादन्यायिचौरादिनिवारकम् पुनः शीतवेगमथनम्-आतपेनेति सूर्य प्रेक्षते इति क्रियापदयोजना-पुनर्भरुगिरिसततपरिवर्तकम् (तद्यथा) मेरुपर्वतमाश्रित्य भ्रमन्तश्च निरन्तरम् / / प्रदक्षिणाभियोगेन जगतः श्रेयसे नु किम् // 1 // पुनर्विशालम् पुना रश्मिसहस्रप्रदलितदीप्तशोभम्-स्वकिरणद्वाराप्रहतचन्द्रादिशोभमिति-अत्र सहस्रकिरणमिति लोकप्रसिद्धया कालविशेषावधिका एव तस्य किरणाः-उक्तश्च लौकिकशास्त्रेऽपि यथा चैत्रादिमासक्रमेणेत्थं रश्मयो ज्ञेया-चैत्रे द्वादश शतानि 1200 वैशाखे त्रयोदशश 1300 ज्येष्ठश्रावणभाद्रपदमासेषु प्रत्येकञ्चतुर्दशश 1400 आषाढे 1500 पञ्चदशश आश्विनमासे षोडशशतानि 1600 कार्तिक माघमासयोरेकादशश 1100 मार्गशीर्ष-फाल्गुनमासयोः प्रत्येकं पश्चाशदधिकसहस्रं प्रमाणा रश्मयः 1050 पौंषमासे सहस्र 1000 रश्मयः // सुगमाय यन्त्रो विलोक्यताम् // चैत्रे | वैशाखे | ज्येष्ठे | आषाढे श्रावणे | भाद्रपदे | आश्विने | कार्तिके मार्गशीपे | पौषे | माधे | फाल्गुने / 1200 1300 | 1400 | 1500 | 1400 | 1400 | 1600 | 1100 | 1050 1000/ 1100 | 1050 पतादृशं सूर्य त्रिशला सप्तम स्वप्ने पश्यति // 7 // 39 // मलपाठः-तओ पुणो जच्चकणगलहिपाठिअं. समूहनीलरत्तपीअसुकिल सुकुमालुल्लसिअमोरपिच्छकयमुद्धयं, धयं,
SR No.600451
Book TitleKalpasutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakvimalsuri
PublisherMuktivimal Jain Granthmala
Publication Year1968
Total Pages512
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size40 MB
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