________________ श्री कल्पमु- कावल्या चतुर्दशस्वप्नाधिकारः // 79 // सागर ससंककिरण दगरय रयय महासेल पंडुरतरं समागयमहयर सुगंधदाण वासिअकवोलमूलं देवराय कुंजरवरप्पमाणं पिच्छइ सजलवणविपुल जलहर गज्जिय गंभीर चारुयोसं इमं सुमं सव्व लक्खग कयंवि वरोरुं // 1 // 33 // // व्याख्या // ततः सा त्रिशलाः क्षत्रियाणी तत् प्रथमतया-इभं स्वप्ने पश्यति इति सम्बन्धः-अत्रायम्परामर्शः। ऋपभदेवजननी प्रथम स्वप्ने वृषभमपश्यत्-तथा श्री महावीरप्रभु जननी प्रथम स्वप्ने सिहमद्राक्षीत-किश्चाधिक जिनेश्वर जननीभिः प्रथमस्वप्ने गजो दृष्टः इत्येतत्पाठानुक्रमापेक्षया बहुपाठ रक्षणार्थमत्रापि श्री महावीरस्वामि माता हस्ती दष्ट:इतिपाठ एव योग्यः। किम्विशिष्टमिभमित्याह-चतुर्दन्तं पुनरुच्छ्रितगलितविपुलजलधरहारनिकरक्षीरसागरशशांक किरणजलकणरजतमहाशैलपाण्डुरम्-पतैर्विशेषणैः श्वेतवर्णमिति-पुनर्गन्धलोमेन समागत मधुकर शोभितम् हस्ती पुनःविशिष्ट गन्धाधिवासितम् पुनर्मदवारिसुरभीकृतकपोल मूलम् पुनः शास्त्रोक्तप्रमाणेन देवराज कुअरवर प्रमाणम्-एवम्भूतं प्रेक्षते-पश्यतीत्यर्थः पुनः किम्विशिष्टम् सजलघन विपुलजलधरगर्जितगम्भीरचारुघोषम् // इमं गजमू शुभं प्रशस्यम् सर्वोत्तम लक्षणकदम्बजातम् पुर्नवरोरुम्-एवम्विधं हस्तिवरं त्रिशला प्रथम स्वप्ने // पश्यतीति भावः // 33 // मूलपाठः-तओ पुणो धवलकमलपत्तपयराइरेगरूवप्पभं, पहासमुदओवहारेहिं सबओ चेव दीवयंतं, अइसिरिभर पिल्लणाविसप्पंत कंत सोहंत चारु ककुहं तणुसुइ सुकुमाल लोमनिद्धच्छविं थिरसुबद्धमंसलोवचित्र लट्ठ सुविमत्तसुन्दरंग पिच्छइ घण-वट्ट लटू उकिट तुप्पग्ग तिक्खसिंगं दंत सिवं समाण सोहंत सुद्धदंतं वसहं अमिअगुणमंगल मुहं // 2 // 34 // // व्याख्या // ततो गजदर्शनान्तरं सा त्रिशला द्वितीय स्वप्ने वृषभं पश्यति-किम्विशिष्टं वृषभमित्याह. धवल