SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 437
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ आवश्यकनियुक्तेरव-| करणनि क्षेपाः मा० मा चूर्णिः // 429 // | तथा योग्यताकरणं, अथवा परप्रत्यययोगात्सायेव करणं धर्मादीनां, एवं अरूपिद्रव्याण्याश्रित्योक्तं साद्यनादि च विश्रसाकरणं, रूपिद्रव्याण्यधिकृत्य साद्यवेत्याह-सादि चक्षुःस्पर्श चाक्षुषमभ्रादि, अचाक्षुषमण्वादि, करणताचेह कृतिः करणमिति कृत्वा // 154 // संघायमेअतदुभयकरणं इंदाउहाइ पञ्चक्खं / दुअअणुमाईणं पुण छउमत्थाईणऽपञ्चक्खं // 155 // (भा०) इदमेव विशेषेणाह-संघातभेदतदुभयैः करणमिन्द्रायुधादि प्रत्यक्षं चाक्षुष, ब्यणुकादीनामनन्ता(णु)कान्तानां करणं छद्मस्थादीनामप्रत्यक्षं // 155 // प्रयोगकरणमाहजीवमजीवे पाओगिअंच चरमं कुसुंभरागाई। जीवप्पओगकरणं मूले तह उत्तरगुणे अ॥१५६॥ (भा.) प्रायोगिकं द्विधा-जीवप्रायोगिकमजीवप्रायोगिकं च / चरम-कुसुम्भरागादि, जीवप्रयोगकरणं द्विधा-मूलगुणकरणमुत्तरगुणकरणं च // 156 // व्यासार्थमाहजं जं निजीवाणं कीरह जीवप्पओगओ तं तं / वन्नाइ रूवकम्माइ वावि अज्जीवकरणं तु॥१५७॥ (भा०) वर्णादि कुसुम्भादेः रूपकर्मादि वा कुदिमादी अजीवविषयत्वादजीवकरणं // 157 // जीवप्पओगकरणं दुविहं मूलप्पओगकरणं च / उत्तरपओगकरणं पंच सरीराइं पढमंमि // 158 // (भा०) ओरालियाइआइं ओहेणिअरं पओगओ जमिह / निप्फण्णा निष्फजइ आइल्लाणं च तं तिण्हं // 159 // (भा०) _औदारिकादीनि पञ्च शरीराणि ओघेन सामान्येन, प्रवाहतस्तैजसकार्मणयोरनादित्वं, व्यक्त्यपेक्षया तु मनुष्यादिभवेषूत्पन्नस्तद्योग्यं प्रथमं यत् पुद्गलग्रहणं करोति तत्तयोरपि संघात करणमुच्यते, इतरदुत्तरकरणं, प्रयोगतो यद् लोके निष्पन्नाः, // 429 //
SR No.600447
Book TitleAvashyak Sutra Niryukterev Churni Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManvijay
PublisherDevchandra Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund
Publication Year1965
Total Pages460
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_aavashyak
File Size37 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy