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________________ XXX सामायिक आवश्यकनिर्युक्तेरव चूर्णिः // 382 // &&&&& लामे &&& सो वाणरजूहवती कतारे सुविहियाणुकंपाए। भासुरवरबोंदिधरो देवो वेमाणिओ जाओ॥८४७॥ ___ अथर्वतैः सामायिकलाभ:अब्भुट्ठाणे विणए परक्कमे साहुसेवणाए य / सम्मदंसणलंभो विरयाविरईइ विरईए // 848 // अभ्युत्थाने सति सम्यगदर्शनलाभः स्यात् , तथा विनयेऽञ्जलिप्रग्रहादी, 'पराक्रमें' कषायजये सति, साधुसेवनायां च सत्यां, विरताविरतेश्च स्यात् // 848 // कथमिति गतं, तदित्थं लब्धं सत् कियच्चिरं स्यादित्याहसम्मत्तस्स सुयस्स य छावट्ठी सागरोवमाइं ठिई / सेसाण पुव्वकोडी देसूणा होइ उक्कोसा // 849 // शेषयोर्देशविरतिसर्वविरत्योः, जघन्यत आद्यत्रयस्यान्तर्मुहुर्त, सर्वविरते समयः, चारित्रपरिणामारम्भे समयान्तरमेवायुकक्षयसम्भवात् , देशविरतिप्रतिपत्तिपरिणामस्त्वान्तर्मुहर्तक एव // 849 // अधुना कइत्ति द्वारं, कति (तीति कियन्तः) वर्तमानसमये सम्यक्त्वादीनां प्रतिपत्तारः प्राक्प्रतिपन्नाः प्रतिपतिता बेत्याहसम्मत्तदेसविरया पलियस्स असंखभागमेत्ता उसेढीअसंखभागो सुए सहस्सग्गसो विरई // 850 // क्षेत्रपलिताऽसङ्ख्येयभागे यावन्तःप्रदेशास्तावन्त उत्कृष्टतः सम्यक्त्वदेशविरत्योरेकदा प्रतिपत्तारः स्युः, किन्तु देशविरतिप्रतिपत्तृभ्यः सम्यक्त्वप्रतिपत्तारो असङ्ख्येयगुणाः, जघन्यत एको द्वौ वा, श्रेण्यऽसङ्ख्येयभागे यावन्तः प्रदेशास्तावन्त एकदा उत्कृष्टतः सामान्यश्रुते-अक्षरात्मके सम्यगमिथ्यात्वानुगते प्रतिपत्तारः स्युः, जघन्यत एको द्वौ वा, सहस्राग्रशो विरतिमधिकृत्य उत्कृष्टतः प्रतिपत्तारः, जघन्यत एको द्वौ वा // 850 // प्राक्प्रतिपन्नानिदानी प्रतिपादयन्नाह अन्यानि कारणानि कियचिरं स्थात् कियन्तश्च प्रतिपद्यमाना दयः नि० गा० 847-850 IN // 382 //
SR No.600447
Book TitleAvashyak Sutra Niryukterev Churni Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManvijay
PublisherDevchandra Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund
Publication Year1965
Total Pages460
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_aavashyak
File Size37 MB
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