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________________ बावश्यकनियुक्तेरव चूर्णिः // 334 // __ अन्ये आचार्या इत्थं भणन्ति-किल पूर्वमेव व्याख्यानारम्भकाले ज्येष्ठं वन्दन्ते॥७१०॥द्वारगाथापश्चार्द्ध व्याचिख्यासुराह-15 दशविधचोएति जइ हु जिट्ठो कहिंचि सुत्तत्थधारणाविगलो / वक्खाणलद्धिहीणो निरत्थयं वंदणं तंमि // 711 // सामाचारी अह वयपरियाएहिं लहुगोऽविहु भासओ इहं जेट्ठो। रायणियवंदणे पुण तस्सवि आसायणा भंते!॥७१२॥ नि. गा. अथ वयःपर्यायाभ्यां लघुरपि भाषक एवेह ज्येष्ठः, रत्नाधिकवन्दने पुनस्तस्याप्याशातना भदन्त ! प्राप्नोति, तथाहि- 711-716 न युज्यत एव चिरप्रवजितान् लघोर्वन्दनं दापयितुं // 711-712 // इत्थमाशङ्कय आहजइवि वयमाइएहिं लहुओ सुत्तत्थधारणापडुओ / वक्खाणलद्धिमंतो सो चिय इह घेप्पई जेहो // 713 / / - आशातनापरिजिहीर्षया त्वाह आसायणावि णेवं पडुच जिणवयणभासयं जम्हा / वंदणयं राइणिए तेण गुणेणंपि सो चेव // 714 // 'तेन गुणेन' अर्हद्वचनव्याख्यानलक्षणेन // 714 // प्रसङ्गतो वन्दनविषय एव निश्चयव्यवहारमतमाहन वओ एत्थ पमाणं न य परियाओऽवि णिच्छयमएणं / ववहारओ उ जुज्जइ उभयनयमयं पुण पमाणं // 715 // अत्र वन्दनविधौ ज्येष्ठवन्दनादिव्यवहारलोपातिप्रसङ्गानिवृत्त्यर्थमाह-व्यवहारतस्तु युज्यते, किमत्र प्रमाणमित्याहउभयमतं पुनः प्रमाणं // 715 // प्रकृतमेवार्थ समर्थयति // 334 // निच्छयओ दुन्नेयं को भावे कम्मि वद्दई समणो ? / ववहारओ उ कीरह जो पुव्वठिओ चरित्तंमि // 716 // व्यवहारतस्तु क्रियते वन्दनं 'यः पूर्व स्थितश्चारित्रे' व्यवहारस्यापि च बलवत्त्वात् // 716 // आह च भाष्यकार:
SR No.600447
Book TitleAvashyak Sutra Niryukterev Churni Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManvijay
PublisherDevchandra Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund
Publication Year1965
Total Pages460
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_aavashyak
File Size37 MB
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