________________ आवश्यकनिर्युक्तेरवचूर्णिः चतुर्विधदेवागमः शिविकाप्रमाणं च भा. गा. 90-96, // 27 // 'उच्छयं' व्याप्तं // 89 // भवणवइवाणमंतरजोइसवासी विमाणवासी अ। धरणियले गयणयले विजुज्जोओ कओ खिप्पं ॥९॥(भा०)। ज्योतिर्वासिनश्च, ज्योतिःशब्देनेह तदालया एवोच्यन्ते, विद्युद्वदुयोतः॥९॥ जाव य कुंडग्गामो जाव य देवाण भवणआवासा। देवेहि य देवीहिं य अविरहिअं संचरंतेहिं // 91 // (भा०)। गगनतलं धरणितलं च देवैर्देवीभिरविरहितं व्याप्त सञ्चरद्भिः॥ 91 // चंदप्पभा य सीआ उवणीआ जम्ममरणमुक्कस्स / आसत्तमल्लदामा जलयथलयदिव्वकुसुमेहिं // 92 // (भा०) ____ आसक्तानि माल्यदामानि यस्यां सा तथा, तथा जलस्थलजदिव्यकुसुमैश्चर्चितेति वाक्यशेषः॥९२॥शिबिकाप्रमाणमाहपंचासइआयामा धणूणि वित्थिण्ण पण्णवीसं तु / छत्तीसं उव्विद्धा सीया चंदप्पभा भणिआ // 93 // (भा०) पञ्चाशद्धनूंष्यायामो यस्याः सा पञ्चाशदायामा // 93 // सीआइ मज्झयारे दिव्वं मणिकणगरयणचिंचइअं / सीहासणं महरिहं सपायवीढं जिणवरस्स // 94 // (भा०) मणयः-चन्द्रकान्ताद्याः कनक-देवकाञ्चनं रत्नानि-मरकतादीनि तैः 'चिंचइति देश्या खचितमित्युच्यते, जिनस्य, | कृतमिति वाक्यशेषः // 94 // आलइअमालमउडो भासुरबोंदी पलंबवणमालो / सेययवत्थनियत्थो जस्स य मोल्लं सयसहस्सं // 95 // (भा०) छट्टेणं भत्तेणं अज्झवसाणेण सोहणेण जिणो। लेसाहिं घिसुझंतो आरुहई उत्तमं सीअं॥९६॥ (भा०) . RXXXXXXXXXX************ * // 27 //