________________ आवश्यकनिर्युक्तेरव जिनान्तराणि चूर्णिः // 246 // अष्ट अन्तकृता रामाः, भवान्तं कृत्वा सिद्धिं गता इत्यर्थः / एकोऽन्त्यः पुनर्ब्रह्मलोककल्पे उत्पत्स्यते उत्पन्नो वेति | क्रिया, 'तत्तों' ततश्च ब्रह्मलोकात् च्युत्वा सेत्स्यति-मोक्षं यास्यति भारते वर्षे // 414 // अनिआणकडा रामा सव्वेऽवि अ केसवा निआणकडा / उहुंगामी रामा केसव सव्वे अहोगामी // 415 // अनिदानकृता रामाः, सर्वेऽपि च केशवा निदानकृताः, ऊर्द्धगामिनो रामाः, केशवा अधोगामिनः, पूर्वापरनिपातः प्राकृतत्वात् , अन्यथा अकृतनिदाना रामा इति द्रष्टव्यं, केशवास्तु कृतनिदानाः॥४१५ // एवं जिणचक्कि.' इत्यादिद्वारगाथा व्याख्याता, अथ यश्चक्री केशवो वा यस्मिन् जिने जिनान्तरे वाऽऽसीत्स प्रतिपाद्यत इत्यनेन सम्बन्धेन जिनान्तराणि निदर्यन्ते उसभो वरवसभगई ततिअसमापच्छिमंमि कालंमि। उप्पण्णो पढमजिणो भरहपिआ भारहे वासे // 1 // चतुरशीत्या पूर्वलक्षरेकोननवत्या पक्षैश्च शेषैस्तृतीयारकस्य // 1 // पण्णासा लक्खेहिं कोडीणं सागराण उसभाओ। उप्पण्णो अजिअजिणो ततिओ तीसाऍ लक्खेहिं // 2 // पञ्चाशता सागरोपमकोटिलक्षैर्ऋषभादजित उत्पन्नः, तृतीयस्त्रिंशता सागरोपमकोटिलक्षैः॥२॥ जिणवसहसंभवाओ दसहि उ लक्खेहि अयरकोडीणं / अभिनंदणो उ भयवं एवइकालेण उप्पण्णो॥३॥ सम्भवाद्दशभिः सागरकोटिलक्षैरभिनन्दनः॥३॥ अभिणंदणाउ सुमती नवहि उ लक्खेहि अयरकोडीणं / उप्पण्णो सुहपुण्णो सुप्पभनामस्स वोच्छामि // 4 // // 246 //