________________ आवश्यक नियुक्तेरव चूर्णिः // 229 // तायंमि पूइए, चक्क पूइअं पूअणारिहो ताओ। इहलोइअं तु चकं परलोअसुहावहो ताओ // 343 // ताते पूजिते सति चक्रं पूजितमेव, तत्पूजानिबन्धनत्वाच्चक्रस्य, पूजामर्हतीति पूजार्हस्तातो वर्तते देवेन्द्रादिनुतत्वात् , इहलौकिकं तु चक्रं, तुरेवार्थः, परलोकसुखावहस्तातः, शिवसुखहेतुत्वात् [तत्पूजाकरणसन्देशव्यापृतो बभूव] // 343 // तस्मात्तिष्ठतु तावच्चक्रं, तातस्य पूजां कर्तुं युज्यते' इति सम्प्रधार्यसह मरुदेवीइ निग्गओ, कहणं पवज उसभसेणस्स। बंभीमरीइदिक्खा, सुंदरी ओरोह सुअदिक्खा // 344 // ___ भरतो मरुदेव्या सह भगवद्वन्दनार्थ गतः, मरुदेव्यै प्रभुऋद्धिकथनं धर्मकथनं वा, ऋषभसेनो (नस्य) भरतपुत्रस्य प्रव्रज्या, ब्राह्मीमरीचिदीक्षा, सुन्दर्या अवरोधार्थ धारणं, सा श्राविका जाता, सुतदीक्षा // 344 // पंच य पुत्तसयाई, भरहस्स य सत्त नत्तूअसयाई / सयराहं पवइआ, तंमि कुमारा समोसरणे // 345 // भवणवइवाणमंतरजोइसवासी विमाणवासी अ। सविडिइ सपरिसा, कासी नाणुप्पायमहिमं // 346 // पञ्च पुत्रशतानि भरतस्य, सप्त नप्तृशतानि पौत्रशतानीत्यर्थः, 'सयराह' देशीवचनं युगपदर्थाभिधायक, तस्मिन् समवसरणे कुमाराः प्रव्रजिताः॥ 345 // सुगमा // 346 // दद्ण कीरमाणिं, महिमं देवेहि खत्तिओ मरिई। सम्मत्तलबुद्धी, धम्मं सोऊण पवइओ॥ 347 // मागहवरदामपभास-सिंधुखंडप्पवायतमिसगुहा / सहि वाससहस्से, ओअविउं आगओ भरहो // 1 // (प्र० अ०) भरतपूजा मरुदेवीकेवलमोक्षौ पुत्रपौत्र दीक्षा मरीचिदीक्षा नि० गा. 343-347 SXXXXXXXXXXXX // 229 // मा०५०२०