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________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ 16 शतके उद्देशकः 5 सूत्रम् 576 गङ्गदत्तपूर्वभवादि // 1177 // तओ पच्छा ण्हाए जहा पूरणे जाव जेट्टपुत्तं कुटुंबे ठावेति तं मित्तणाति जाव जेट्टपुत्तं च आपुच्छति 2 पुरिससहस्सवाहणिं सीयं दुरूहति पुरिससह० 2 मित्तणातिनियगजाव परिजणेणं जेट्टपुत्तेण यसमणुगम्ममाणमग्गं सव्विड्डीए जावणादितरवेणं हत्थिणागपुरं मज्झम० निग्ग०नि०२ जे० सहसंबवणे उ० ते० उवा० 2 छत्तादिते तित्थगरातिसए पासति एवं जहा उदायणो जाव सयमेव आभरणं मुयइ स० 2 सयमेव पंचमुट्ठियं लोयं करेति स० 2 जे० मुणि० अरहा एवं जहेव उदायणो तहेव पव्वइए, तहेव एक्कारस अंगाई अहिज्जइ जाव मासियाए संलेहणाए सटुिं भत्ताई अणसणाए जाव छेदेति सहिँ भत्ताई०२ आलोइयपडिक्वंते समाहिपत्ते कालमासे कालं किच्चा महासुक्के कप्पे महासामाणे विमाणे उववायसभाए देवसयणिज्जंसि जाव गंगदत्तदेवताए उववन्ने, तए णं से गंगदत्ते देवे अहुणोववन्नमेत्तएस. पंचविहाए पजत्तीए पजत्तिभावं गच्छति, तंजहा-आहारपज्जत्तीए जाव भासामणपज्जत्तीए, एवं खलु गोयमा! गंगदत्तेणं देवेणं सा दिव्वा देवड्डी जाव अभिसम० / गंगदत्तस्स णं भंते! केवतियं कालं ठिती प०?, गोयमा! सत्तरससागरोवमाइं ठिती, गंगदत्ते णं भंते! देवे ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव महावि० वासे सिज्झिहिति जाव अंतं काहिति।सेवं भंते! रत्ति॥ सूत्रम् 576 // 16-5 // दिवं तेयलेस्सं असहमाणे त्ति इह किल शक्रः पूर्वभवे कार्त्तिकाभिधानोऽभिनवश्रेष्ठी बभूव गङ्गदत्तस्तु जीर्णः श्रेष्ठीति, तयोश्च प्रायो मत्सरो भवतीत्यसावसहनकारणं संभाव्यत इति, एवं जहा सूरियाभो त्ति अनेनेदं सूचितं 'सम्मादिट्ठी मिच्छादिट्ठी परित्तसंसारिए अणंतसंसारिए सुलभबोहिए दुल्लभबोहिए आराहए विराहए चरिमे अचरिमे' इत्यादीति // षोडशशतस्य पञ्चमोद्देशः परिपूर्णतां प्राप्तः / / 5-6 // // 576 // 16-5 // // 1177 //
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
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