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________________ श्रीभगवत्यक श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1559 // पदान्यभिहितानीह तु नारकादीनि चतुर्विंशतिरेवेति, एतदेवाह नेरइयाइओ त्ति नारकादयोऽत्र वाच्या इत्यर्थः तहेव नवदंडगसंगहिओ त्ति पापकर्मज्ञानावरणादिप्रतिबद्धा ये नव दण्डकाः प्रागुक्तास्तैः सङ्ग्रहीतो युक्तो य उद्देशकः स तथा // 1 // ॥८१६॥षड्रिंशतमशते तृतीयः॥२६-३॥ 26 शतके उद्देशक: 4-12 सूत्रम् 817 अनन्तरावगाढादीनां पापबन्धित्वादि ॥षड्रिंशशतके चतुर्थादारभ्याद्वादशान्ता उद्देशकाः॥ अणंतरोगाढएणं भंते! नेरइए पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, गोयमा! अत्थेगतिए० एवं जहेव अणंतरोववन्नएहिं नवदंडगसंगहिओ उद्देसो भणिओ तहेव अणंतरोगाढएहिवि अहीणमतिरित्तो भाणियव्वो नेरइयादीए जाव वेमाणिए। सेवं भंते! 2 // 26-4 // 1 परंपरोगाढएणं भंते! नेरइए पावं कम्मं किंबंधी जहेव परंपरोववन्नएहिं उद्देसो सोचेव निरवसेसो भा०। सेवं भंते! 2 // 26-5 // 1 अणंतराहारएणंभंते! ने० पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, एवं जहेव अणंतरोववन्नएहिं उद्देसो तहेव निरवसेसं। सेवं भंते! 2 // 26-6 // 1 परंपराहारएणं भंते! ने० पावं कम्मं किं बंधी पुच्छा, गोयमा! एवं जहेव परंपरोववन्नएहिं उद्देसो तहेव निरवसेसो भा०।सेवं भंते! सेवं भंते! ।।२६-७॥१अणंतरपज्जत्तएणं भंते! ने० पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, गोयमा! जहेव अणंतरोववन्नएहिं उद्देसो तहेव निरवसेसं / सेवं भंते! २॥२६-८॥१परंपरपज्जत्तएणं भंते! ने० पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, गोयमा! एवं जहेव परंपरोव उद्देसो तहेव निरवसेसो भा० / सेवं! 2 जाव विहरइ॥२६-९॥१चरिमे णं भंते! ने० पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, गोयमा! एवं जहेव परंपरोवव० उद्देसो तहेव चरिमेहिं निरवसेसो। सेवं भंते! 2 जाव वि०॥२६-१०॥१अचरिमे णं भंते! ने० पावं कम्मं किं बंधी? पुच्छा, गोयमा! अत्थेगइए एवं जहेव पढमोद्देसए पढमबितिया भंगा भा० सव्वत्थ जाव पंचिंदियतिरिक्खजोणियाणं / 2 अचरिमे // 1559 //
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
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