________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1458 // 25 शतके उद्देशकः 4 सूत्रम् 737 पर्यायकृतयुग्मादि बहुत्वे जीवा ओघतो विधानतश्च चतुरग्रसमयस्थितिका एव, अनाद्यनन्तत्वेनानन्तसमयस्थितिकत्वात्तेषाम्, नारकादयः पुनर्विचित्रसमयस्थितिकाः,तेषांचसर्वेषां स्थितिसमयमीलने चतुष्कापहारे चौघादेशेनस्यात् कृतयुग्मसमयस्थितिका इत्यादि, विधानतस्तु युगपञ्चतुर्विधा अपि // 25 // अथ भावतो जीवादि तथैव प्ररूप्यते 27 जीवेणं भंते! कालवन्नपज्जवेहिं किं कडजुम्मे? पुच्छा, गोयमा! जीवपएसे पडुच्चणो कडजुम्मे जावणोकलियोगेसरीरपएसे पडुच्च सिय कडजुम्मे जाव सिय कलियोगे, एवं जाव वेमाणिए, सिद्धोण चेव पुच्छिन्नति / 28 जीवाणं भंते! कालवन्नपज्जवेहिं पुच्छा, गोयमा! जीवपएसे पडुच्च ओघादेसेणवि विहाणा०विणोकडजुम्मा जावणो कलिओगा, सरीरपएसे पडुच्च ओघा० सिय कडजुम्मा जाव सिय कलियोगा, विहाणा० कडजुम्मावि जाव कलि०, एवं जाव वेमा०, एवं नीलवन्नपज्जवेहिं दंडओ भा० एगत्तपुहत्तेणं एवं जाव लुक्खफासपज्जवेहिं॥२९ जीवेणंभंते! आभिणिबोहियणाणपज्जवेहिं किं कडजुम्मे पुच्छा, गोयमा! सिय कडजुम्मे जाव सिय कलियोगे, एवं एगिदियवज्जं जाव वेमाणिए। 30 जीवा णं भंते! आभिणिबोहियणाणप० पुच्छा, गोयमा! ओघा० सिय कडजुम्मा जाव सिय कलियोगा, विहाणा० कडजुम्मावि जाव कलियोगावि, एवं एगिदियवज्जं जाव वेमा०, एवं सुयणाणपज्जवेहिवि, ओहिणाणपज्जवेहिवि एवं चेव, नवरं विकलिंदियाणं नत्थि ओहिनाणं, मणपज्जवनाणंपि एवं चेव, नवरं जीवाणं मणुस्साण य, सेसाणं नत्थि, 31 जीवे णं भंते! केवलनाणप० किं कडजुम्मा पुच्छा, गोयमा! कडजुम्मे णो तेयोगेणो दावरजुम्मे णो कलियोगे, एवं मणुस्सेवि, एवं सिद्धेवि, 32 जीवा णं भंते! केवलनाणपुच्छा, गोयमा! ओघा०वि विहाणादे० कडजुम्मा नोतेओ० नोदावर० णो कलियो०, एवं मणुस्सावि, एवं सिद्धावि।३३जीवेणं भंते! मइअन्नाणपज्जवेहिं किंकडजुम्मे०?, जहा आभिणिबोहियणाणप० तहेव दो दंडगा, एवं सुयन्नाणप०वि, एवं विभंगनाणप०वि / चक्खुदंसणअचखुदंसण // 1458 //