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________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ सुहुम सुहुम बादर बेइंद्री | बेइंद्री | तेइंद्रि तेइंद्री | चउरिंद्री चउरिंद्री | असन्नी | असन्नी | सन्नी | सन्नी अपज्जत्त | अपज्जत्त | अपजत्त पन्जत्त अपज्जत्त पजत्त | अपजत्त पज्जत्त अपज्जत्त | पञ्जत्त अपज्जत्त पज्जत्त जघन्य जघन्य जघन्य | जघन्य जघन्य जघन्य जघन्य जघन्य जघन्य जघन्य जघन्य जघन्य जघन्य असं.२ 3 / 14 4 / 15 / 5 / उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट | उत्कृष्ट उत्कृष्ट उत्कृष्ट | उत्कृष्ट 10 / 24 / 20 - 25 / 21 26 25 शतके उद्देशकः१ सूत्रम् 718 समविषमयोगिता पञ्चदशयोगजघन्यादिः // 1421 // योगाधिकारादेवेदमाह 4 दो भंते! नेरतिया पढमसमयोववन्नगा किं समजोगी किं विसमजोगी?, 4 गोयमा! सिय समजोगी सिय विसमजोगी, से केणटेणं भंते! एवं वुच्चति सिय समजोगी सिय विसमजोगी?, गोयमा! आहारयाओवासे अणाहारए अणाहारयाओवासे आहारए सिय हीणे सिय तुल्ले सिय अब्भहिए जड़ हीणे असंखेज्जइभागहीणे वा संखेज्जइभागहीणे वा संखेज्जगुणहीणे वा असंखेज्जगुणहीणे वा अह अब्भहिए असंखेज्जइभागमब्भहिए वा संखेज्जइभागम० वा संखेज्जगुणम० वा असंखेजगुणम० वा से तेणटेणं जाव सिय विसमजोगी एवं जाव वेमाणियाणं। सूत्रम् 718 // दो भंते इत्यादि, प्रथमः समय उपपन्नयोर्ययोस्तौ प्रथमसमयोपपन्नौ , उपपत्तिश्चेह नरकक्षेत्रप्राप्तिः सा च द्वयोरपि विग्रहेण 8 // 1421 // ऋजुगत्यावा एकस्य वा विग्रहेणान्यस्य ऋजुगत्येति, समजोगि त्ति समोयोगो विद्यते ययोस्तौसमयोगिनौ, एवं विषमयोगिनी, आहारयाओवेत्यादि, आहारकाद्वाऽऽहारकं नारकमाश्रित्य से त्ति स नारकोऽनाहारक अनाहारकाद्वाऽऽनाहारकं नारकमाश्रित्या-3
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
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