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________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1395 // 24 शतके उद्देशक: 17-1819-20 सूत्रम् 708-711 विकलोत्पादः जहन्नकालट्ठितीएसु उववन्नो एस चेव वत्तव्वया, णवरं कालादे० ज० दो अंतो०, उ० चत्तारि पुव्वकोडीओ चउहिं अंतोमुहुत्तेहिं अब्भहियाओ 2, 40 सो चेव उक्कोसकालट्ठितीएसु उवव० ज० तिपलिओवमट्ठिइएसु, उ.वि तिपलि. सच्चेव वत्तव्वया नवरं ओगाहणाज० अंगुलपुहुत्तं, उ० पंच धणुसयाई, ठिती ज० मासपुहुत्तं, उ० पुव्वकोडी एवं अणुबंधोवि, भवादेसेणं दो भवग्गहणाई कालादे० ज० तिन्नि पलिओवमाई मासपुहुत्तमन्भहि०, उ० तिन्नि पलिओवमाई पुव्वकोडीए अब्भ० एवतियं०३, 41 सो चेव अप्पणा जहन्नकालट्ठिइओजाओजहा सन्निपंचिंदियतिरिक्खजोणियस्स पंचिंदियतिरिक्खजोणिएसु उववज्जमाणस्समज्झिमेसु तिसुगमएसु वत्तव्वया भणिया एस चेव एयस्सविम०तिसुग० निरवसेसा भा०, नवरंपरिमाणं उक्को० संखेज्जा उवव०सेसंतंचेव६, 42 सोचेव अप्पणा उक्कोसकालट्ठितीओजातो सच्चेव पढमगमगवत्तव्वया नवरं ओगाहणाज० पंच धणुसयाई, उ० पंच धणुसयाई, ठिती अणुबंधो ज० पुव्वको०, उ० पुव्वकोडी सेसं तहेव जाव भवादेसोत्ति, कालादे० ज० पुव्वको० अंतोमुत्तमब्भ०, उ० तिन्नि पलिओवमाइं पुव्वकोडिपुहुत्तमब्भहियाईएवतियं 7,43 सोचेव जहन्नकालट्ठितीएसु उववन्नो एस चेव वत्तव्वया नवरंकालादे० ज. पुव्वकोडी अंतोमुत्तमब्भहिया, उ० चत्तारि पुव्वकोडीओचउहिं अंतोमुत्तमब्भहियाओ८, 44 सोचेव उक्कोसकालट्ठितिएसु उववन्नो ज० तिन्नि पलिओवमाई, उ०वि तिन्नि पलि० एस चेव लद्धी जहेव सत्तमगमे भवादे दो भवग्गहणाई कालादेसेणं ज० तिन्निपलिओवमाई पुव्वकोडीए अब्भहियाई उ०वि तिन्नि पलि० पुव्वकोडीए अब्भ० एवतियं 9 // 45 जइ देवेहिंतो उवव० किं भवणवासिदेवेहिंतो उवव० वाणमंतर० जोइसिय० वेमाणियदेवे०?, गोयमा! भवणवासिदेवे जाव वेमाणियदेवे०,४६ जड़ भवाणवासि० किं असुरकुमारभवणजावथणियकुमारभव०?, गोयमा! असुरकुमारजाव थणियकुमारभवण०, 47 असुरकुमारेणं भंते! जे भविएपंचिंदियतिरिक्खजोणिएसुउववजित्तए सेणंभंते! केवति?, गोयमा! ज० अंतोमुत्तद्वितीएसु, उ० पुव्वकोडिआउएसु // 1395 //
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
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