________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1357 // 24 शतके उद्देशकः१ सूत्रम् 696 मनुष्येभ्य उत्पादः त्रयश्च वेदा उक्ताः इह तु सप्तमपृथिवीचतुर्थगमे प्रथममेव संहननं स्त्रीवेदनिषेधश्च वाच्य इति ४,शेषगमास्तु स्वयमेव ऊह्याः॥ 81-85 // // 695 // मनुष्याधिकारे 87 जइ मणुस्सेहिंतो उववजंति किं सन्निम०हिंतो उव० असन्निम०हिंतो उववजंति?, गोयमा! सन्निमणुस्सेहितो उववजंति णो असन्नीम०हिंतो उव०,८८ जइसन्निम०हिंतो उव० किंसंखेजवासाउयसन्निमणुस्सेहितोउवव०, असंखेजवा० जाव उवव०?,गोयमा! संखेज्जवासाउयसन्निमणु०, णो असंखेन्जवासाउयजाव उव०, 89 जइ संखेन्जवासा जाव उव० किं पज्जत्तसंखेज्जवासाउय० अपज्जत्तसंखेज्जवासाउय०?, गोयमा! प०सं०वासाउय०, नो अप०सं०वासाउय जाव उव०, 90 प०सं०वासाउय० सन्निमणुस्से णं भंते!जे भविए नेरइएसु उववजित्तए सेणंभंते! कति पुढवीसुउव०?, गोयमा! सत्तसुपुढवीसुउव० सं० रयणप्पभाए जाव अहेसत्तमाए, 91 प०सं०वासा०सन्निमणुस्से णं भंते! जे भविए रयणप्पभाए पुढवीए ने० उववज्जित्तए से णं भंते! केवतिकालट्ठिइएसु उववजेज्जा?,गोयमा! जह० दसवाससहस्सट्टितीएसु, उ० सागरोवमट्टि० उव०, 92 ते णं भंते! जीवा एगसमएणं केवइया उव०?, गोयमा! ज० एक्को वा दो वा तिन्नि वा, उ० संखेज्जा उव०, संघयणा छ सरीरोगाहणा ज० अंगुलपुहुत्तं, उ० पंचधणुसयाई एवं सेसं जहा सन्निपंचिंतिरि०जोणियाणं जावभवादेसोत्ति, नवरं चत्तारिणाणा तिन्नि अन्नाणा भयणाए छ समुग्धाया केवलिवज्जा ठिती अणुबंधो य ज० मासपुहुत्तं, उ० पुव्वकोडी सेसं तं चेव कालादेसेणं ज० दसवाससहस्साई मासपुहुत्तमन्भहियाई, उ० चत्तारि सागरोवमाइंचउहिं पुव्वकोडीहिं अब्भ० एवतियंजाव करेजा 1,93 सोचेवजहन्नकालट्ठितीएसु उववन्नोसा चेव वत्तव्वया, नवरं कालादेसेणंज० दसवाससहस्साईमासपु०ब्भहियाई, उ० चत्तारिपुव्वकोडीओ चत्तालीसाए वाससहस्सेहिं अन्भहियाओ एवतियं 2, 94 सो चेव उक्कोसकालट्ठितीएसु उववन्नो एस चेव वत्तव्वया नवरं कालादेसेणं ज० सागरोवमं मासपु०न्भहियं, उ० चत्तारि // 1357 //