________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1316 // 20 शतके उद्देशकः७ सूत्रम् 674 जीवप्रयोगबन्धादि ॥विंशतितमशतके सप्तमोद्देशकः॥ षष्ठोद्देशके पृथिव्यादीनामाहारो निरूपितः, स च कर्मणो बन्ध एव भवतीति सप्तमे बन्धो निरूप्यते, इत्येवंसम्बद्ध स्यास्येदमादिसूत्रं १कइविहे णं भंते! बंधे प०?, गोयमा! तिविहे पं० त० जीवप्पयोगबंधे 1 अणंतरपओगबंधे 2 परंपरबंधे 3 / 2 नेरइयाणं भंते! क०प० एवं चेव, एवं जाव वेमाणियाणं। 3 नाणावरणिज्जस्स णं भंते! कम्मस्स क० बंधे प०?, गोयमा! तिविहे बंधे प० तं० जीवप्पयोगबंधे अणंतरबंधे परंपरबंधे, 4 ने० भंते! नाणावरणिज्जस्स कम्मस्स क० बंधे प० एवं चेव जाव वेमा०, एवं जाव अंतराइयस्स।५णाणावरणिज्जोदयस्सणं भंते! कम्मस्स क० बंधे प०?, गोयमा! तिविहे बंधे पं० एवं चेव एवं नेरइयाणवि एवं जाव वेमा०, एवं जाव अंतराइउदयस्स, 6 इत्थीवेदस्सणं भंते! क० बंधे प०? गोयमा! तिविहे बंधे प०, एवं चेव, 7 असुरकुमाराणं भंते! इत्थीवेदस्स क० बंधे प०?, गो०! तिविहे बंधे प० एवं चेव एवं जाव वेमा०, नवरं जस्स इत्थिवेदो अत्थि, एवं पुरिसवेदस्सवि एवं नपुंसगवे. जाव वेमा०, नवरंजस्स जो अत्थि वेदो, 8 दंसणमोहणिजस्सणं भंते! कम्मस्स क० बंधे?, एवं चेव निरंतरंजाव वेमा०, एवं चरित्तमोहणिज्जस्सवि जाव वेमा०, एवं एएणं कमेणं ओरालियसरीरस्स जाव कम्मगसरीरस्स आहारसन्नाए जाव परिग्गहस० कण्हलेसाए जाव सुक्कलेसाए सम्मदिट्ठीए मिच्छादिट्ठीए सम्मामिच्छादिट्ठीए आभिणिबोहियणाणस्स जाव केवलनाणस्स मइअन्नाणस्स सुयअन्नाणस्स विभंगनाणस्स एवं आभिणिबो० णाणविसयस्स भंते! क० बं० प०? जाव केवलनाणविसयस्स मइअन्नाणवि० सुयअन्नाणवि० विभंगणाणविस० एएसिं सव्वेसिं पदाणं तिविहे बंधे प० सव्वेऽवेते चउव्वीसं दंडगा भा० नवरं जाणियव्वं जस्स जइ अत्थि जाव वेमाणि० भंते! विभंगणाणविसयस्स कइवि० बंधे प०, गोयमा! तिविहे बंधे प०जीवप्पयोगबंधे // 1316 //