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________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1267 // 19 शतके उद्देशकः१ सूत्रम् 648 लेश्या: ॥एकोनविंशशतके प्रथमोद्देशकः। व्याख्यातमष्टादशशतम्, अथावसरायातमेकोनविंशतितमं व्याख्यायते, तत्र चादावेवोद्देशकसङ्ग्रहाय गाथा लेस्सा य१गब्भ पुढवी 3 महासवा 4 चरम 5 दीव 6 भवणा 7 य / निव्वत्ति 8 करण ९वणचरसुरा 10 य एगूणवीसइमे॥१॥ रायगिहे जाव एवं वयासी- कति णं भंते! लेस्साओ पन्नत्ताओ?, गोयमा! छल्लेसाओ पन्नत्ताओ, तंजहा- एवं जहा पन्नवणाए / चउत्थोलेसुद्देसओ भाणियव्वो निरवसेसो। सेवं भंते २॥सूत्रम् 648 // 19-1 // लेस्से त्यादि, तत्र लेस्सा य त्ति लेश्याः प्रथमोद्देशके वाच्या इत्यसौ लेश्योद्देशक एवोच्यते, एवमन्यत्रापि 1, चशब्दः समुच्चये, गब्भ त्ति गर्भाभिधायको द्वितीयः 2, पुढवि त्ति पृथिवीकायिकादिवक्तव्यतार्थस्तृतीयः 3, महासव त्ति नारका महाश्रवा महाक्रिया इत्याद्यर्थपरश्चतुर्थः 4, चरम त्ति चरमेभ्योऽल्पस्थितिकेभ्यो नारकादिभ्यः, परमा महास्थितयो महाकर्मतरा इत्याद्यर्थप्रतिपादनार्थः पञ्चमः 5, दीव त्ति द्वीपाद्यभिधानार्थः षष्ठः 6, भवणा यत्ति भवनाद्यर्थाभिधानार्थः सप्तमः 7, निव्वत्ति त्ति निर्वृत्तिर्निष्पत्तिः,शरीरादेस्तदर्थोऽष्टमः 8, करण त्ति करणार्थो नवमः 9, वणचरसुरा य त्ति वनचरसुरा व्यन्तरा देवास्तद्वक्तव्यतार्थो दशम इति 10, तत्र प्रथमोद्देशकस्तावव्याख्यायते, तस्य चेदमादिसूत्रं- रायगिहे इत्यादि, पन्नवणाए चउत्थो लेसुद्देसओ भाणियव्वो त्ति प्रज्ञापनायाश्चतुर्थो लेश्यापदस्य सप्तदशस्योद्देशको लेश्योद्देशक इह स्थाने भणितव्यः, सच 'कण्हलेसा जाव सुक्कलेसें' त्यादिरिति // 648 // एकोनाविंशतितमशते प्रथम उद्देशकः समाप्तः // 19-1 // // 1267 //
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
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