SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 164
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय. वृत्तियुतम् भाग-B | // 1242 // कालान्तरेणापि लभ्यते न तथा वनस्पतीनाम्, तेषां परम्परया सिद्धिगमनेन तद्राशेरनन्तत्वापरित्यागेऽप्यनियतरूपत्वादिति, काल सिद्धा जहा वणस्सइकाइयत्ति जघन्यपद उत्कृष्टपदेचापदाः, अजघन्योत्कृष्टपदे च स्यात् कृतयुग्मादय इत्यर्थः, तत्र जघन्योत्कृष्टपदापेक्षयाऽपदत्वं वर्द्धमानतया तेषामनियतपरिमाणत्वाद्भावनीयमिति // 5-7 // // 624 // जीवपरिमाणाधिकारादिमाह जावइए त्यादि, यावन्तः वर त्ति अर्वाग्भागवर्तिन आयुष्कापेक्षयाऽल्पायुष्का इत्यर्थः अंधगवण्हिणो त्ति अंहिपा वृक्षास्तेषां वह्नयस्तदाश्रयत्वेनेत्यंहिपवह्नयो बादरतेजस्कायिका इत्यर्थः, अन्ये त्वाहुः- अन्धका अप्रकाशकाः सूक्ष्मनामकर्मोदयाद्ये वह्नयस्तेऽन्धकवह्नयो जीवाः तावइय त्ति तत्परिमाणाः पर त्ति पराः प्रकृष्टाः स्थितितो दीर्घायुष इत्यर्थ इति प्रश्नः, हंते त्याद्युत्तरमिति // 8 // // 625 // अष्टादशशते चतुर्थः॥१८-४॥ 18 शतके उद्देशक:५ सूत्रम् 626 असुरादिप्रासादीयता ॥अष्टादशशतके पञ्चमोद्देशकः॥ चतुर्थोद्देशकान्ते तेजस्कायिकवक्तव्यतोक्ता तेच भास्वरजीवा इति पञ्चमे भास्वरजीवविशेषवक्तव्यतोच्यत इत्येवंसम्बद्धस्यास्येदमादिसूत्र १दो भंते! असुरकुमारा एगंसि असुरकुमारावासंसि अकुल्देवत्ताए उववन्ना तत्थ णं एगे अ०कुमारे देवे पासादीए दरिसणिज्जे अभिरूवे पडिरूवे एगे अकुमारे देवे से णं नोपासादिए नो दरिसणिज्जे नो अभिरूवे नो पडिरूवे से कहमेयं भंते! एवं ?, गोयमा! असुरकुमारा देवा दुविहा प०, तं०- वेउव्वियसरीरा य अवेउव्वियसरीरा य, तत्थ णंजे से वे०सरीरे अकुमारे देवे से णं पासादीए जाव पडिरूवे, तत्थ णंजे से अवे०सरीरे अ०कुमारे देवे से णं नो पासादीए जाव नो पडिरूवे, से केणटेणं भंते! एवं वु० तत्थ णंजे // 1242 //
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy