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________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय B888888888888888888 वृत्तियुतम् भाग-३ 17 शतके उद्देशकः 6-17 सूत्रम् 604-615 पृथ्व्यादीनां संप्राप्त्युत्पादौ // 1214 // 1 पुढविकाइएणं भंते! इमीसे रय० पुढ० समोहए 2 जे भविए सोहम्मे कप्पे पुढविक्काइयत्ताए उववज्जित्तए से भंते! किं पुव्विं उववजित्ता पच्छा संपाउणेज्जा पुट्विं वा संपाउणित्ता पच्छा उवव०?, गोयमा! पुग्विं वा उववजित्ता पच्छा संपाउणेजा पुव्विं वा संपाउणित्ता पच्छा उववजेजा, सेकेणटेणंजाव पच्छा उव०?,गोयमा! पुढविक्काइयाणंतओसमुग्घाया पं०, तं०- वेदणासमुग्घाए कसायस. मारणंतियस०, मारणंतियसमुग्घाएणंसमोहणमाणे देसेण वा समोहणति सव्वेण वा समो० देसेणं समोहन्नमाणे पुब्विं संपाउणित्ता पच्छा उववजिजा, सव्वेणंसमोहणमाणे पुट्विं उववजेत्ता पच्छा संपाउणेज्जा, से तेणटेणं जाव उव० / 2 पुढविक्काइए णं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए जाव समोहए स०२ जे भविए ईसाणे कप्पे पुढवि एवं चेव ईसाणेवि, एवं जाव अचुयगेविजविमाणे, अणुत्तरवि० ईसिपब्भाराए य एवं चेव। 3 पुढविकाइए णं भंते! सक्करप्पभाए पुढवीए समोहए 2 स० जे भविए सोहम्मे कप्पे पुढवि० एवं जहा रयणप्पभाए पुढविकाइए उववाइओ एवं सक्करप्पभाएवि पुढवि० उववाएयव्वो जाव ईसिपब्भाराए,एवं जहा रयणप्पभाए वत्तव्वया भणिया एवं जाव अहेसत्तमाए समोहए ईसीपब्भाराए उववाएयव्वो। सेवं भंते! त्ति ॥सूत्रम् 604 // 17-6 // १पुढविकाइएणं भंते! सोहम्मे कप्पे समोहए समोहणित्ता जे भविए इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए पुढवीकाइयत्ताए उववजित्तए सेणंभंते! किं पुब्विं सेसंतंचेव जहा रयणप्पभापुढवि० सव्वकप्पेसुजाव ईसिपब्भाराए ताव उववाइओ एवं सो०पुढविकाइओवि सत्तसुवि पुढवीसु उववाएयव्वो जाव अहेसत्तमाए, एवं जहा सोहम्मपुढविकाइओ सव्वपुढवीसु उववाइओ एवं जाव ईसिपब्भारापुढविकाइओसव्वपुढवीसु उववाएयव्वो जाव अहेसत्तमाए, सेवं भंते! 2 // सूत्रम् 605 // 17-7 // 1 आउक्काइए णं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए समोह० 2 जे भविए सोहम्मे कप्पे आउकाइयत्ताए उववज्जित्तए एवं जहा // 1214 //
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
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