________________ ॥सप्तदशशतके पञ्चमोद्देशकः॥ चतुर्थोद्देशकान्ते वैमानिकानां वक्तव्यतोक्ता,अथ पञ्चमोद्देशके वैमानिकविशेषस्य सोच्यत इत्येवंसम्बन्धस्यास्येदमा श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-३ // 1213 // दिसूत्रं 17 शतके उद्देशक:५ | सूत्रम् 603 ईशानसुधर्मसभा | उद्देशक:६ 88888 १कहिणं भंते! ईसाणस्स देविंदस्स देवरन्नो सभा सुहम्मा प०?, गोयमा! जंबुद्दीवे 2 मंदरस्स पव्वयस्स उत्तरेणं इमीसे रयणप्प० पुढ० बहुसमरमणिज्जाओ भूमिभागाओ उट्ठेचंदिमसूरियजहा ठाणपदे जावमझे ईसाणवडेंसए महाविमाणे सेणं ईसाणव० महावि० अद्धतेरस जोयणसयसहस्साइंएवं जहा दसमसए सक्ववि०वत्तव्वया सा इहवि ईसाणस्स निरवसेसा भाणि जाव आयरक्खा, ठिती सातिरेगाइंदो सागरोवमाई, सेसं तंचेव जाव ईसाणे देविंदे देवराया ई०२, सेवं भंते! रत्ति ॥सूत्रम् 603 // 17-5 // / कहि ण मित्यादि, जहा ठाणपए त्ति प्रज्ञापनाया द्वितीयपदे, तत्र चेदमेवं- 'उड़े चंदिमसूरियगहगणणक्खत्ततारा रूवाणं बहूइंजोयणसयाइंबहूइंजोयणसहस्साईबहूइंजोयणसयसहस्साईजाव उप्पइत्ता एत्थ णं ईसाणे णामंकप्पे पन्नत्ते' इत्यादि, एवं जहा दसमसए सक्कविमाणवत्तव्वये त्यादि, अनेन च यत्सूचितं तदित्थमवगन्तव्यं-'अद्धतेरसजोयणसयसहस्साइं आयामविक्खंभेणं ऊयालीसं च सयसहस्साई बावनं च सहस्साइं अट्ठ य अडयाले जोयणसए परिक्खेवेण'मित्यादि॥१॥॥ 602 // सप्तदशशते पञ्चमः // 17-5 // 1213 // ॥सप्तदशशतके षष्ठोद्देशकः॥ पञ्चमोद्देशक ईशानकल्प उक्तः, षष्ठे तु कल्पादिषु पृथिवीकायिकोत्पत्तिरुच्यत इत्येवंसम्बन्धस्यास्येदमादिसूत्रं