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________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय. वृत्तियुतम् भाग-३ // 1201 // 17 शतके उद्देशकः१ सूत्रम् 592-593 शरीरादिभ्यः किया। बहुतरत्वात् 6, एतेषां च सूत्राणां विशेषतो व्याख्यानं पञ्चमशतोक्तकाण्डक्षेप्तृपुरुषसूत्रादवसेयम्, एतानि च फलद्वारेण षट् क्रियास्थानान्युक्तानि, मूलादिष्वपि षडेव भावनीयानि, एवं जाव बीयंति अनेन कन्दसूत्राणीवस्कन्धत्वक्शालप्रवालपत्रपुष्पफलबीजसूत्राण्यध्येयानीति सूचितम् / / 7-10 // // 591 // क्रियाधिकारादेव शरीरेन्द्रिययोगेषु क्रियाप्ररूपणार्थमिदमाह-8 ११कतिणं भंते! सरीरगा पण्णत्ता?, गोयमा! पंच सरीरगा पन्नत्ता, तंजहा-ओरालिय जाव कम्मए।१२ कति णं भंते! इंदिया पं०?, गोयमा! पंच इंदिया पं०, तं०- सोइंदिए जाव फासिंदिए।१३ कतिविहे णं भंते! जोए प०?, गोयमा! तिविहे जोए प०, तं०मणजोए वयजोए कायजोए।१४ जीवेणंभंते! ओरालियसरीरं निव्वत्तेमाणे कतिकिरिए?, गोयमा! सिय तिकिरिएसिय चउकिरिए सिय पंचकिरिए, एवं पुढविक्काइएविएवं जावमणुस्से।१५ जीवाणं भंते! ओरालियसरीरं निव्वत्तेमाणा कतिकिरिया?, गोयमा! तिकिरियावि चउकिरियावि पंचकिरियावि, एवं पुढविकाइया एवं जाव मणुस्सा, एवं वेउव्वियसरीरेणवि दो दंडगा नवरं जस्स अत्थि वेउव्वियं एवंजाव कम्मगसरीरं, एवं सोइंदियंजाव फासिंदियं, एवंमणजोगंवयजोगंकायजोगंजस्सजं अत्थितंभाणियव्वं, एए एगत्तपुहुत्तेणं छव्वीसंदंडगा ॥सूत्रम् 592 // __ कति णं भंते! इत्यादि, तत्र जीवे णं भंते! इत्यादौ सिय तिकिरिए सिय चउकिरिए सिय पंचकिरिए त्ति यदा औदारिकशरीरं परपरितापाद्यभावेन निवर्त्तयति तदा त्रिक्रियः, यदा तु परपरितापं कुर्वस्तन्निवर्तयति तदा चतुष्क्रियः, यदातु परमतिपातयंस्तन्निवर्तयति तदा पञ्चक्रिय इति / पृथक्त्वदण्डके स्याच्छब्दप्रयोगो नास्ति,एकदाऽपि सर्वविकल्पसद्भावादिति / छव्वीस दंडगं त्ति पञ्चशरीराणीन्द्रियाणि च त्रयश्च योगाः एते च मीलितास्त्रयोदश, एते चैकत्वपृथक्त्वाभ्यां गुणिताः षड्डिंशतिरिति // 14-15 // // 592 // अनन्तरं क्रिया उक्तास्ताश्च जीवधर्मा इति जीवधर्माधिकाराज्जीवधर्मरूपान् भावानभिधातुमाह // 1201 //
SR No.600445
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size38 MB
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