________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-२ // 998 // अविरहिया विरहिया वा, एवं असंखेजवित्थडेसुवि तिन्नि गमगा भाणियव्वा, एवं सक्करप्पभाएवि, एवं जाव तमाएवि / 18 अहेसत्तमाए णं भंते! पु० पंचसु अणुत्तरेसु जाव संखेजवित्थडे नरए किं सम्मद्दिट्ठीनेरइया पुच्छा, गोयमा! सम्मद्दिट्टीने० न उव० मिच्छादिट्ठीने. उव० सम्मामिच्छदिट्ठी ने न उव० एवं उव्वद्भृतिवि अविरहिए जहेव रयणप्पभाए, एवं असंखेजवित्थडेसुवि तिन्नि गमगा॥सूत्रम् 471 // 19 से नूणं भंते! कण्हलेस्से नीललेस्से जाव सुक्कलेस्से भवित्ता कण्हलेस्सेसु नेरइएसु उव०?, हंता गोयमा! कण्हलेस्से जाव उव०, से केण भंते! एवं वु. कण्हलेस्से जाव उव०?, गोयमा! लेस्सट्ठाणेसु संकिलिस्समाणेसु 2 कण्हलेसं परिणमइ कण्ह० २(णमित्ता) कण्हलेसेसुनेरइएसु उव० से तेण० जाव उव०।२० से नूणं भंते! कण्हलेस्से जाव सुक्कलेसे भवित्ता नीललेस्सेसुनेरइएसु उव.?, हंता गोयमा! जाव उव०, से केणटेणं जाव उववजंति?, गोयमा! लेस्सट्ठाणेसु संकिलिस्समाणेसु वा विसुज्झमाणेसु नीललेस्सं परिणमंति नील०२(णमित्ता) नीललेस्सेसुनेरइएसु उव० से तेण० गोयमा! जाव उव०, 21 से नूणं भंते! कण्हलेस्से नील जाव भवित्ता काउलेस्सेसु नेरइएसु उव० एवं जहा नीललेस्साए तहा काउलेस्साविभाणियव्वा जाव से तेणटेणं जाव उववजंति। सेवं भंते! 2 // सूत्रम् 472 // 13-1 // 1 पुढवी त्यादि, पुढवी ति नरकपृथिवीविषयः प्रथमः 1, देव त्ति देवप्ररूपणार्थो द्वितीयः 2 अणंतर त्ति, अनन्तराहारा नारका इत्याद्यर्थः प्रतिपादनपरस्तृतीयः३, पुढवि त्ति पृथिवीगतवक्तव्यताप्रतिबद्धश्चतुर्थः 4, आहारे त्ति नारकाद्याहारप्ररूपणार्थः पञ्चमः 5, उववाए त्ति नारकाधुपपातार्थः षष्ठः 6, भास त्ति भाषार्थः सप्तमः 7 कम्म त्ति कर्मप्रकृतिप्ररूपणार्थोऽष्टमः 8, अणगारे केयाघडिय त्ति, अनगारो भावितात्मा लब्धिसामर्थ्यात्, केयाघडिय त्ति रज्जुबद्धघटिकाहस्तः सन् विहायसिव्रजेदित्या 13 शतके उद्देशकः१ नरकपृथिव्यधिकारः। सूत्रम् 471 सम्पनरकपृथ्वीषुसडचातासहयातयोजनन०वासेषु सम्यग्दृष्ट्यादीनामुत्पादोद्वर्तनासत्ताप्रश्राः / सूत्रम् 472 नारकेषु कृष्णादिलेश्यावान्भूत्वा कृष्णादिलेश्यावत्सु नारकेषूत्पादप्रश्नाः / // 228