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________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-२ // 864 // दब्भसगब्भकलसाहत्थगए गंगाओ महानईओ पच्चुत्तरइ रत्ता जेणेव सए उडए ते० उवा० ते. उवा०त्ता दन्भेहि य कुसेहि य वालुयाएहि यवेतिंरएति रत्ता सरएणं अरणिं महेति सर० रत्ता अग्गिंपाडेति रत्ता अग्गिं संधुक्केइ रत्ता समिहाकट्ठाईपक्खिवइ स०प०त्ता अग्गिं उज्जालेइ अ० उ०त्ता- अग्गिस्स दाहिणे पासे, सत्तंगाई समादहे / तंजहा-सकहं वक्कलं ठाणं, सिजा भंडं कमंडलुं॥१॥दंडदारुं तहा(ऽप्पा)पाणं अहे ताइं समादहे॥ महुणा य घएण य तंदुलेहि य अग्गिं हुणइ, अग्गिं हुणित्ता चरुं साहेइ, चरुं साहेत्ता बलिं वइस्सदेवं करेइ बलिं वइत्ता अतिहिपूयं करेइ अति त्ता तओ पच्छा अप्पणा आहारमाहारेति, 6 तए णं से सिवे रायरिसी दोच्चं छट्ठक्खमणं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ, तएणं से सिवेरायरिसी दोच्चे छट्ठक्खमणपारणगंसि आयावणभूमीओ पच्चोरुहइ आयावण रत्ता एवं जहा पढमपारणगं नवरं दाहिणगं दिसं पोक्खेति रत्ता दाहिणाए दिसाए जमे महाराया पत्थाणे पत्थियं सेसं तं चेव आहारमाहारेइ, तएणंसे सिवरायरिसी तच्चंछट्ठ क्खमणं उवसंपजित्ताणं विहरति, तएणं से सिवेरायरिसी सेसंतंचेव नवरंपच्चच्छिमाए दिसाए वरुणे महाराया पत्थाणे पत्थियंसेसंतंचेव जाव आहारमाहारेइ, तएणंसे सिवेरायरिसी चउत्थं छट्ठक्खमणं उवसंपज्जित्ताणं विहरइ, तए णं से सिवेरायरिसी चउत्थं छट्ठक्खमणं एवं तं चेव नवरं उत्तरदिसं पोक्खेइ उत्तराए दिसाए वेसमणे महाराया पत्थाणे पत्थियं अभिरक्खउ सिवं, सेसंतंचेव जाव तओ पच्छा अप्पणा आहारमाहारेइ॥सूत्रम् 417 // 7 तएणंतस्स सिवस्स रायरिसिस्स छटुंछट्टेणं अनिक्खित्तेणं दिसाचक्कवालेणंजाव आयावेमाणस्स पगइभद्दयाए जाव विणीययाए अन्नया कयावि तयावरणिज्जाणं कम्माणं खओवसमेणं ईहापोहमग्गणगवेसणं करेमाणस्स विब्भंगे नामं अन्नाणे समुप्पन्ने, सेणं तेणं विब्भंगनाणेणं समुप्पन्नेणं पासइ अस्सिं लोए सत्त दीवे सत्त समुद्दे तेण परं न जाणति न पासति, 8 तए णं तस्स सिवस्स रायरिसिस्स अयमेयारूवे अब्भत्थिए जाव समुप्पज्जित्था- अत्थिणं ममं अइसेसे नाणदंसणे समुप्पन्ने एवं खलु अस्सिं लोए सत्त 11 शतके उद्देशकः 9 शिवराजर्षिरधिकारः / सूत्रम् 417 हस्तिनापुरः शिवराजदिक्प्रोक्षकतापसप्रवज्यास्वीकार: यावजीवषष्ठतपाभिग्रहादि। सूत्रम् 418 शिवराजर्षेविभड्रेन सप्तद्वीपसमुद्रज्ञानप्ररूपणा च ।श्रीगौतमस्यप्रशः प्रभरिसख्यातद्वीपकथनश्रुत्वाऽजाननाशदीक्षामोक्षादि। // 864 //
SR No.600444
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages574
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size15 MB
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