________________ श्रीभगवत्य श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-२ // 745 // पंक० होज्जा एवं जाव अ० एगे रयण एगे सक्कर० चत्तारि अहेसत्त होज्जा अ० एगे रयण दो सक्कर तिन्नि वालुय० होजा, एवं एएणं कमेणं जहा पंचण्हं तियासंजोगो भणिओ तहा छण्हवि भाणियव्वो नवरं एक्को अहिओ उच्चारेयव्वो, सेसं तं चेव 34, चउक्कसंजोगोवि तहेव, पंचगसंजोगोवि तहेव, नवरं एक्को अन्भहिओ संचारयेव्वोजाव पच्छिमोभंगो अ र दो वालुय एगे पंक० एगे धूम० एगे तम० एगे अहेसत्त० होज्जा अ० एगे रयण एगे सक्कर० जाव एगे तमाए होज्जा 1 अहवा एगे रयण जाव एगे धूम० एगे अहेसत्त होज्जा 2 अ० एगे रयण जाव एगे पंक० एगे तमाए द्विकसंयोगाः 105 त्रिकसंयोगाः 350 एगे अहेसत्त होज्जा 3 अ० एगे रयण जाव एगे वालुय० एगे धूम जाव एगे अहेसत्त० होज्जा 4 अ० एगे | चतुष्कसंयोगाः 350 रयण एगे सक्कर० एगे पंक० जाव एगे अहेसत्त० होज्जा 5 अ० एगे रयण० एगे वालुय० जाव एगे अहेसत्त० पंचकसंयोगाः 105 षट्कसंयोगाः 7 होज्जा 6 अहवा एगे सक्कर० एगे वालुय० जाव एगे अहेसत्तमाए होज्जा ७॥सूत्रम् 373 (अपूर्णम् // 16 छन्भंते नेरइये त्यादि। इहैकत्वे सप्त, द्विकयोगे तु षण्णां द्वित्वे पश्च विकल्पास्तद्यथा-१५।२४।३३। 42 / 51 तैश्च सप्तपदद्विकसंयोगएकविंशतेर्गुणनात् पश्चोत्तरं भङ्गकशतं भवति, त्रिकयोगे तुषण्णां त्रित्वे दश विकल्पास्तद्यथा।११४ / 123 / 213 / 132 // 222 / 312 / 141 / 231 / 321 / 411 / एतैश्च पञ्चत्रिंशतः सप्तपदत्रिकसंयोगानां गुणनात् त्रीणि शतानि पञ्चाशदधिकानि भवन्ति, चतुष्कसंयोगे तुषण्णांचतूराशितया स्थापने दश विकल्पास्तद्यथाछ। 1113 / 1122 / 1212 / 2112 / 1131 / 1221 / 2121 / 1311 / 2211 / 3111 / पञ्चत्रिंशतश्च सप्तपदचतुष्कसंयोगानां दशभिर्गुणनानिणि शतानि पञ्चाशदधिकानि भवन्ति, पञ्चकसंयोगे तु षण्णां पञ्चधाकरणे पञ्च विकल्पास्तद्यथा-११११२ / 11121 / 11211 / 12111 / 21111 / सप्तानां च पदानां पञ्चकसंयोग ९शतके उद्देशकः 32 गाङ्गेयाधिकारः। सूत्रम् 373 (अपूर्णम्) षण्णारकजीवप्रवेशनके, एकद्व्यादिसंयोगी 7,5,10, 10,5,1 इत्यादिविविधभङ्गप्रश्नाः / 25 mm Nw // 745 // 105