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________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-२ // 680 // सागरोवमाई वासपुहुत्तमम्भहियाई उक्को० अणंतं कालं वणस्सइकालो, देसबं० जह० वासपुहुत्तं उक्को० वणस्सइकालो॥ 58 जीवस्स णं भंते! अणुत्तरोववातियपुच्छा, गोयमा! सव्वबं० जह० एकतीसं सागरोवमाई वासपुहुत्तमब्भहियाई उक्को संखेजाई सागरोवमाई, देसबं० जह० वासपुहुत्तं उक्को० संखेजाइंसागरोवमाइं॥५९ एएसिणं भंते! जीवाणं वेउब्वियसरीरस्स देसबंधगाणं सव्वबंधगाणं अबंधगाण यकयरे 2 हितोजाव विसेसाहियावा?,गोयमा! सव्वत्थोवाजीवावेउब्वियसरीरस्ससव्वबंधगा देसबंधगा असंखेनगुणा अबंधगा अणंतगुणा // 60 आहारगसरीरप्पयोगबंधेणं भंते! कतिविहे प०?, गोयमा! एगागारे प०।६१ जइ एगागारे प० किं मणुस्साहारगसरीरप्पयोगबंधे किं अमणुस्साहारगस०?, गोयमा! मणुस्साहारगस० नो अमणुस्साहारगस०, एवं एएणं अभिलावेणं जहा ओगाहणसंठाणे(प्रज्ञा० पद 29 प० 423-1) जाव इड्विपत्तपमत्तसंजयसम्मद्दिट्ठिपज्जत्तसंखेज्जवासाउयकम्मभूमिगग(मगन्भमिगन्भ)ब्भवक्वंतियमणुस्साहारगस० णो अणिटिपत्तपमत्त जाव आहारगरसरीरप्पयोगबंधे / 62 आहारगसरीरप्पयोगबंधेणंभंते! कस्स कम्मस्स उदएणं?, गोयमा! वीरियसयोगसद्दव्वयाए जाव लद्धिं (च-वा) प० आहारगसरीरप्पयोगणामाए कम्मस्स उदएणं आहारगसरीरप्पयोगबंधे।६३ आहारगसणंभंते! किं देसबंधेसव्वबंधे?, गोयमा! देसबंधेविसव्वबंधेवि। 64 आहारगस० णं भंते! कालओ के होइ?, गोयमा! सव्व० एक्कं समयं देस० जह• अंतोमुहुत्तं उक्कोसेणवि अंतोमु०॥ 65 आहारगसरीरप्पयोगबंधंतरे णं भंते! कालओ के० होइ?, गोयमा! सव्वबं० जह० अंतोमु० उक्को अणंतं कालं अणंताओ ओसप्पिणिउस्सप्पिणीओ कालओ, खेत्तओ अणंता लोया अवठ्ठपोग्गलपरियट्ट देसूणं, एवं देसबंधंतरंपि॥६६ एएसिणं भंते! जीवाणं आहारगसरीरस्स देसबंधगाणं सव्वबंधगाण (णं) अबंधगाण य कयरे 2 जाव विसेसाहिया वा?, गोयमा! सव्वत्थोवा जीवा आहारगसरीरस्स सव्वबंधगा देसबं० संखेजगुणा अब अणंतगुणा ३॥सूत्रम् 349 // 8 शतके उद्देशक:९ प्रयोगबन्धाघधिकारः। सूत्रम् 349 नैरयिकादीनां वैक्रियशरीरप्रयोगबन्धस्यकर्म, देशबन्धादिकालान्तरादि अल्पबहुत्वादिप्रश्नाः। // 680 //
SR No.600444
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages574
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size15 MB
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