________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय. वृत्तियुतम् भाग-२ // 630 // 8 शतके उद्देशकः६ प्रासुकदानाधिकारः। सूत्रम् 334 नोवि०,सेय संपट्ठिए संपत्ते अप्पणा य, एवं संपत्तेण वि चत्तारि आलावगा भाणियव्वा जहेव असंपत्तेणं / 12 निग्गंथेण य बहिया वियारभूमिं विहारभूमि वा निक्खंतेणं अन्नयरे अकिच्चट्ठाणे पडिसेविए तस्सणं एवं भवति- इहेव ताव अहं एवं एथवि एते चेव अट्ठ आलावगा भाणियव्वा जाव नो विराहए। निग्गंथेण य गामाणुगामं दूइज्जमाणेणं अन्नयरे अकिचट्ठाणे पडिसेविए तस्स णं एवं भवति इहेव ताव अहं एत्थवितेचेव अट्ठ आलावगाभाणियव्वा जाव नो विराहए॥१३ निग्गंथीए यगाहावइकुलं पिंडवायपडियाए अणुपविट्ठाए अन्नयरे अकिञ्चट्ठाणे पडिसेविए तीसेणं एवं भवइ इहेव ताव अहंएयस्स ठाणस्स आलोएमिजाव तवोकम्मंपडिवजामि तओ पच्छा पवत्तिणीए अंतियं आलोएस्सामि जाव पडिवज्जिस्सामि,सा य संपट्ठिया असंपत्ता पवत्तिणी य अमुहा सिया साणं भंते! किं आराहिया विराहिया?, गोयमा! आ० नो वि०,सायसंपट्ठिया जहा निग्गंथस्स तिन्निगमा भणिया एवं निग्गंथीएवि तिन्नि आलावगा भाणियव्वा जाव आराहिया नो विराहिया // 14 से केणटेणं भंते! एवं वु०- आराहए नो विराहए?, गोयमा! से जहा नामए- केइ पुरिसे एगं महं उन्नालोमं वा गयलोमं वा सणलोमं वा कप्पासलोमं वा तणसूयं वा दुहा वा तिहा वा संखेन्जहा वा छिंदित्ता अगणिकायंसि पक्खिवेज्जा से नूणं गोयमा! छिज्जमाणे छिन्ने पक्खिप्पमाणे पक्खित्ते दज्झमाणे दहेत्ति वत्तव्वं सिया?, हंता भगवं! छिज्जमाणे छिन्ने जाव दद्देत्ति वत्तव्वं सिया, से जहा वा केइ पुरिसे वत्थं अहतं वा धोतं वा तंतुग्गयं वा मंजिट्ठादोणीए पक्खिवेज्जा से नूणं गोयमा! उक्खिप्पमाणे उक्खित्ते पक्खिप्पमाणे पक्खित्ते रज्जमाणे रत्तेत्ति वत्तव्वं सिया?, हंता भगवं! उक्खिप्पमाणे उक्खित्ते जाव रत्तेत्ति वत्तव्वं सिया, से तेणटेणं गोयमा! एवं वु०- आराहए नो विराहए। सूत्रम् 334 // ७निग्गंथेण येत्यादि, इह चशब्दः पुनरर्थस्तस्य घटना चैवं निर्ग्रन्थं कश्चित् पिण्डपातप्रतिज्ञया प्रविष्टंपिण्डादिनोपनिमन्त्रयत्तेन च निर्ग्रन्थेन पुनरकिच्चट्ठाणे त्ति कृत्यस्य करणस्य स्थानमाश्रयः कृत्यस्थानं तन्निषेधोऽकृत्यस्थानं मूलगुणादिप्रतिसेवारूपोऽ अकृत्यसेवायां तत्रान्यदाप्रायश्चिते आराधकत्वादि तत्कारणश्च प्रश्राः / // 630 //