________________ श्रीभगवत्यङ्ग श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-१ ||385 // 10 पुरिसे णं भंते! ध[परामुसइ धणुंपरामुसित्ता उसुंपरामुसइ 2 त्ता ठाणं ठाइ ठाणं ठिच्चा आयतक० उसुंकरेंति आययकन्नाययं उसुं करेत्ता उडे वेहासं उसु उव्विहइ 2 ता ततो णं से उसुंउडं वेहासं उब्विहिए समाणे जाई तत्थ पाणाई भूयाई जीवाई सत्ताई अभिहणइ वत्तेति लेस्सेति संघाएइ संघट्टेति परितावेइ किलामेइ ठाणाओठाणं संकामेइ जीवियाओ ववरोवेइ तएणंभंते! से पुरिसे कतिकिरिए?,गोयमा!जावंचणंसे पुरिसे धणुंपरामुसइ रत्ता जाव उव्विहइतावंचणं से पुरिसेकातियाए जाव पाणातिवायकिरियाए पंचहिं किरियाहिं पुढे, जेसिं पियणं जीवाणं सरीरेहिंधणू निव्वत्तिए तेऽवि यणंजीवा काइयाए जावपंचहि किरियाहिं पुढे, एवं धणुपुढे पंचहिं किरियाहिं, जीवा पंचहिं, हारू पंचहिं, उसू पंचहिं, सरे पत्तणे फले प्रहारू पंचहिं, // सूत्रम् 206 // 11 अहेणं से उसुंअप्पणो गुरुयत्ताए भारियत्ताए गुरुसंभारियत्ताए अहे वीससाए पच्चोवयमाणे जाई तत्थ पाणाईजावजीवियाओ ववरोवेइ तावं च णं से पुरिसे कतिकिरिए?, गोयमा! जावं च णं से उसुं अप्पणो गुरुययाए जाव ववरोवेए तावं च णं से पुरिसे काइयाए जाव चउहि किरियाहिं पुढे, जेसिंपियणं जीवाणं सरीरेहिं धणू निव्वत्तिए तेवि जीवा चउहिं किरियाहिं धणूपुढे चउहिं, जीवा चउहि, हारू चउहिं, उसूपंचहिं, सरे पत्तणे फलेण्हारू पंचहिं, जेविय से जीवा अहे पच्चोवयमाणस्स उवग्गहे चिटुंति तेवि यणंजीवा कातियाए जाव पंचहिं किरियाहिं पुट्ठा // सूत्रम् 207 // 10 पुरिसे ण मित्यादि, परामुसइ त्ति परामृशति गृह्णाति, आययकण्णाययं ति, आयतः क्षेपाय प्रसारितः कर्णायतः कर्ण यावदाकृष्टस्ततः कर्मधारयाद्, आयतकर्णायतोऽतस्तम्, इषुबाणम्, उड्ड वेहासं ति, ऊर्द्धमिति वृक्षशिखराधपेक्षयापि स्यादत आह विहायसी त्याकाश उव्विहइ त्ति, ऊर्दू विजहाति, ऊर्दू क्षिपतीत्यर्थः, अभिहणइ त्ति, अभिमुखमागच्छतो हन्ति, वत्तेइ त्ति वर्तुलीकरोति शरीरसङ्कोचाऽऽपादनात्, लेसेइ त्ति श्लिषयति, आत्मनि श्लेष्टान् करोति, संघाएइ त्ति, अन्योऽन्यं गात्रैः 5 शतके उद्देशक:६ अल्पदीर्घाऽऽयुष्कताऽधिकारः। सूत्रम् 206 पुरुषस्य धनुःपरामृशक्षेपादौ धनुर्पुरुषादीनां क्रिया प्रश्नाः। सूत्रम् 207 | धनुष आत्म गुरुतयादिभिः | पतने क्रिया |प्रश्नाः / // 385 //