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________________ श्रीभगवत्यङ्गं |श्रीअभयवृत्तियुतम् भाग-१ // 370 // देवा इति यद्वस्तु तद्वक्तव्यं स्यादिति। नोसंजयाइ वत्तव्वं सिय त्ति नोसंयता इत्येतद्वक्तव्यं स्यात्, असंयतशब्दपर्यायत्वेऽपि नोसंयतशब्दस्यानिष्ठुरवचनत्वान्मृतशब्दापेक्षया परलोकीभूतशब्दवदिति // 19 // 20 देवाधिकारादेवेदमाह देवा ण मित्यादि विसिस्सइ त्ति विशिष्यते विशिष्टो भवतीत्यर्थः,अद्धमागह त्ति भाषा किल षड्विधा भवति, यदाह प्राकृतसंस्कृतमागधपिशाचभाषा च सौरसेनी च। षष्ठोऽत्र भूरिभेदो देशविशेषादपभ्रंशः॥१॥ तत्र मागधभाषालक्षणं किञ्चित्किञ्चिच्चप्राकृतभाषालक्षणं यस्यामस्ति सार्द्धमागध्येति व्युत्पत्त्याऽर्द्धमागधीति // 191 // केवलिछद्मस्थस्य वक्तव्यताप्रस्ताव एवेदमाह, 21 केवलीणं भंते! अंतकरं वा अंतिमसरीरियं वा जाणति पासइ?, हंता! गोयमा! जा० पा० / 22 जहाणं भंते! केवली अंतकरं वा अंतिमसरीरियं वा जा. पा. तहा णं छउमत्थेवि अंतकरं वा अंतिमस० वा जा० पा०?, गोयमा! णो तिणढे समढे, सोच्चा जा. पा०, पमाणतो वा, 23 से किंतं सोचाणं?, सोच्चा णं केवलिस्सवा केवलिसावयस्स वा के सावियाए वा के उवासगस्स वा के०उवासियाए वा तप्पक्खियस्सवा तप्पक्खियसावगस्स वा तप्पक्खियसावियाए वा तप्पक्खियउवासगस्स वा तप्पक्खियउवासियाए वा से तंसोचा।सूत्रम् 192 // 24 से किंतंपमाणे?,२ पमाणे चउव्विहे पण्णत्ते, तंजहा-पच्चक्खे अणुमाणे ओवम्मे आगमे , जहा अणुओगद्दारे तहाणेयव्वं पमाणं जाव तेण परं नो अत्तागमे नो अणंतरागमे परंपरागमे // सूत्रम् 193 // Oमगहद्धविसयभासानिबद्धं अद्धमागह, अहवा अट्ठारसदेसीभासानियतं अद्धमागधं (निशीथ चूर्णि-आर्य श्री जिनदासमहत्तरजी)। शौरसेन्या अदूरत्वाद्, इयमेव अर्धमागधी ('प्राकृत सर्वस्व' - महर्षि मार्कण्डेय)। |५शतके उद्देशक:४ शब्दाधिकारः। सूत्रम् 192 केवलीछद्यस्थी अंतकरं जानात्यादि प्रश्नाः / सूत्रम् 193 प्रमाणभेद प्रश्ना: // 370 //
SR No.600443
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages578
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size39 MB
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