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________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-१ // 266 // चमर तिष्यकान गारशक्रसा विउवित्तए सक्कस्स णं भंते! देविंदस्स 2 अवसेसा सामाणिया देवा केमहिड्डीया 1 तहेव सव्वं जाव एस णं गोयमा! सक्कस्स 3 3 शतके एगमेगस्स सामाणियस्स देवस्स इमेयारूवे विसए विसयमेत्ते बुइए नो चेव णं संपत्तीए विउव्विंसु वा 3 वा तायत्तीसा य उद्देशकः१ कीदृशी लोगपालअग्गमहिसीणंजहेव चमरस्स नवरंदो केवलकप्पे जंबूद्दीवे 2 अण्णंतंचेव, सेवं भंते रत्ति दोच्चे गो० जाव विहरति ॥सूत्रम् विकुर्वणा 130 // शक्तिः / 11 एवं खल्वि त्यादि, एवमिति वक्ष्यमाणन्यायेन सामानिकदेवतयोत्पन्न इति योगः, तीसए त्ति तिष्यकाभिधानः, सयंसिक सूत्रम् 130 त्तिस्वके विमाने, पंचविहाए पज्जत्तीए त्ति पर्याप्तिराहारशरीरादीनामभिनिर्वृत्तिः,सा चान्यत्र षोढोक्ता,इह तु पञ्चधा, भाषामनः पर्याप्त्योर्बहुश्रुताभिमतेन केनापि कारणेनैकत्वविवक्षणात्, लद्धे त्ति जन्मान्तरे तदुपार्जनापेक्षया, पत्ते त्ति प्राप्ता देवभवा-3 मानिक शक्ति प्रश्नाः। पेक्षयाऽभिसमण्णागए त्ति तद्भोगापेक्षया, 12 जहेव चमरस्स त्ति, अनेन लोकपालाग्रमहिषीणां तिरियं संखेज्जे दीवसमुद्दे त्ति वाच्यमिति सूचितम् // 130 // ईशानेन्द्रवै क्रियशक्ति 13 भंते त्ति भगवंतच्चे गो० वाउभूती अण. समणं भ० जाव एवं व०- जति णं भंते! सक्के देविंदे 2 ए महिड्डीए जाव एवइयं च णं पभू विउव्वित्तए ईसाणेणंभंते! देविंदे 2 केमहि०? एवं तहेव, नवरं साहिए दो केवलकप्पे जंबूदीवे 2 अवसेसं तहेव ॥सूत्रम् 131 // 13 ईसाणे णं भंत इत्यादि, ईशानप्रकरणम्, इह चैवं तहेव त्ति, अनेन यद्यपि शक्रसमानवक्तव्यमीशानेन्द्रप्रकरणं सूचितं तथापि विशेषोऽस्ति, उभयसाधारणपदापेक्षत्वादतिदेशस्येति, स चायं से णं अट्ठावीसाए विमाणावाससयसहस्साणं असीईए सामाणियसाहस्सीणं जाव चउण्हं असीईणं आयरक्खदेवसाहस्सीणं ति॥१३१॥ ईशानवक्तव्यताऽनन्तरंतत्सामानिकवक्तव्यतायां स्वप्रतीतं तद्विशेषमाश्रित्य तच्चरितानुवादतः प्रश्नयन्नाह सूत्रम् 131 प्रश्नः / सा२१ // 266 //
SR No.600443
Book TitleVyakhyapragnaptisutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivyakirtivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages578
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size39 MB
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