________________ श्रीभगवत्यङ्गं श्रीअभय वृत्तियुतम् भाग-१ // 136 // भावा, अणाणुपुव्वी एसा रोहा!। पुव्विं भंते! जीवा पच्छा अजीवा पुग्विं अजीवा पच्छा जीवा?, जहेव लोए य अलोए य तहेव जीवाय अजीवाय, एवं भवसिद्धीया य अभवसिद्धीया य सिद्धी असिद्धी सिद्धा असिद्धा, पुव्विं भंते! अंडए पच्छा कुक्कुडी पुट्विं कुक्कुडी पच्छा अंडए?, रोहा! से णं अंडए कओ?, भयवं! कुक्कुडीओ, साणं कुक्कुडी कओ?, भंते! अंडयाओ, एवामेव रोहा! से य अंडएसा य कुक्कुडी, पुदिपेते पच्छापेते दुवेते सासया भावा, अणाणुपुव्वी एसा रोहा!। पुव्विं भंते! लोयंते पच्छा अलोयंते पुव्वं अलोयंते पच्छा लोयंते!, रोहा! लोयंते य अलोयंते य जाव अणाणुपुव्वी एसा रोहा!। पुव्विं भंते! लोयंते पच्छा सत्तमे उवासंतरे पुच्छा, रोहा! लोयंते य सत्तमे उवासंतरे पुव्विंपि दोवि एते जाव अणाणुपुव्वी एसा रोहा! / एवं लोयंते य सत्तमे य तणुवाए, एवं घणवाए घणोदहि सत्तमा पुढवी, एवं लोयंते एक्केकेणं संजोएयव्वे इमेहिं ठाणेहि-तंजहा-ओवासवायघणउदहि पुढवी दीवा य सागरावासा। नेरइयाई अस्थिय समया कम्माइंलेस्साओ॥१॥दिट्ठी दंसणणाणा सन्न सरीराय जोग उवओगे। दव्वपएसा पनव अद्धा किं पुब्विंलोयंते?॥२॥पुट्विं भंते ! लोयंते पच्छा सव्वद्धा? / जहा लोयंतेणं संजोइया सव्वे ठाणा एते एवं अलोयंतेण वि संजोएयव्वा सव्वे। पुव्विंभंते! सत्तमे उवासंतरेपच्छा सत्तमे तणुवाए?, एवं सत्तमं उवासंतरंसव्वेहिंसमंसंजोएयव्वंजाव सव्वद्धाए। पुव्विं भंते! सत्तमे तणुवाए पच्छा सत्तमे घणवाए, एयंपि तहेव नेयव्वं जाव सव्वद्धा, एवं उवरिल्लं एक्जेक्कं संजोयंतेणंजोजो हिडिल्लो तं तं छड्डुतेणं नेयव्वं जाव अतीयअणागयद्धा पच्छा सव्वद्धा जाव अणाणुपुव्वी एसा रोहा! सेवं भंते! शत्ति जाव विहरइ / / सूत्रम् 53 // __ भंतेत्ति भगवंगोयमे समणंजाव एवं वयासी-कतिविहाणंभंते! लोयट्ठिती पण्णत्ता?, गोयमा! अट्ठविहा लोयट्ठिती पण्णत्ता, तंजहा-आगासपइट्ठिएवाए 1 वायपइट्ठिए उदही 2 उदहीपइट्ठिया पुढवी 3 पुढविपइट्ठिया तसा थावरा पाणा 4 अजीवा जीवपइट्ठिया १शतके उद्देशकः६ सूत्रम् 53 लोकालोकादिकुक्कुटीअण्डकादि भावानां शाश्वतत्वादिप्रश्नाः। सूत्रम् 54 तनुवातघनवातादि अष्टधा लोक. स्थितिप्रश्नाः। // 136 //