________________ [1] उपक्रमः। शा० उपक्रमः। श्रीअनुयोगद्वारंमलधारि श्रीहेमचन्द्रसूरि वृत्तियुतम्। // 234 // १.२नाम। सूत्रम् 293-301 1.2.10 दशनाम। 1.2.10.10 प्रमाणनाम। 1.2.10.10.3 तुरंगा नवतुरगं, दस गामा दसगामं, दस पुरा दसपुरं / सेतं दिगुसमासे / / सूत्रम् 298 // से किंतं तप्पुरिसे समासे? 2 तित्थे कागो तित्थकागो, वणे हत्थी वणहत्थी, वणे वराहो वणवराहो, वणे महिसो वणमहिसो, वणे मयूरो वणमयूरो / सेतं तप्पुरिसे समासे // सूत्रम् 299 // से किंतं अव्वईभावे समासे? 2 अणुगामं अणुणदीयं अणुफरिहं अणुचरियं / सेतं अव्वईभाव समासे॥सूत्रम् 300 // से किंतं एगसेसे समासे? 2 जहा एगो पुरिसो तहा बहवे पुरिसा, जहा बहवे पुरिसा तहा एगो पुरिसो, जहा एगो करिसावणो तहा बहवे करिसावणा, जहा बहवे करिसावणा तहा एगो करिसावणो, जहा एगोसाली तहा बहवे सालिणो जहा बहवे सालिणो तहा एगोसाली। सेतं एगसेसे समासे / सेतं सामासिए। सूत्रम् 301 // से किं तं भावपमाणे, इत्यादि। भावो युक्तार्थत्वादिको गुणः, स एव तहारेण वस्तुनः परिच्छिद्यमानत्वात्प्रमाणम्, तेन द्रव्य निष्पन्नं तदाश्रयेण निर्वृत्तं नाम सामासिकादि चतुर्विधं भवतीत्यत्र परमार्थः // 293 // तत्र से किं तं सामासिए, इत्यादि। षड्भिधम्। द्वयोर्बहूनां वा पदानां समसनं संमीलनं समासस्तेन निर्वृत्तं सामासिकम् / सामासाश्च द्वन्द्वादयः सप्त / / 91 / / 294 / / तत्र भावप्रमाणं समुच्चयप्रधानो द्वन्द्वः, दन्ताश्चौष्ठौ च दन्तोष्ठम्, स्तनौ चोदरं च स्तनोदरमिति, प्राण्यङ्गत्वात्समाहारः / वस्त्रपात्रमित्यादौ त्वप्राणि सामासिकादि। जातित्वादश्वमहिषमित्यादौ पुनः शाश्वतिकवैरित्वाद्, एवमन्यान्यप्युदाहरणानि भावनीयानि // 295 // अन्यपदार्थप्रधानो | बहुव्रीहिः। पुष्पिता: कुटजकदम्बा यस्मिन्गिरौ सोऽयं गिरिः पुष्पितकुटजकदम्बः, तत्पुरुषः समानाधिकरण: कर्मधारयः (पा० 1/2/ 42), स च धवलश्चासौ वृषभश्च धवलवृषभइत्यादि। सङ्ख्यापूर्वो द्विगुः (पा०२/१/५२) त्रीणि कटुकानिसमाहृतानि त्रिकटुकम्, (r) तुरंगा नवतुरंग। पुराणि-10 समासे' इति पदं न वर्तते / 7 साली। धर्मास्तिकायादि |1.2.10.10.4 सप्तविधंसामासिकनिरूपणम्। // 234 //