________________ श्रीदशवैकालिकं श्रीहारि० वृत्तियुतम् // 281 // प्रत्युपेक्ष्य चक्षुषा प्रमृज्य च रजोहरणेन प्रासुकं बीजादिरहितं चेति सूत्रार्थः॥८२॥ तत्र अणुनवि त्ति सूत्रम्, अनुज्ञाप्य सागारिक- पञ्चचममध्ययन परिहारतो विश्रमणव्याजेन तत्स्वामिनमवग्रहं मेधावी साधुः प्रतिच्छन्ने तत्र कोष्ठकादौ संवृत उपयुक्तः सन् साधुरीर्याप्रतिक्रमणं पिण्डैषणा, प्रथमोद्देशकः कृत्वा तदनु हस्तकं मुखवस्त्रिकारूपम्, आदायेति वाक्यशेषः, संप्रमृज्य विधिना तेन कायं तत्र भुञ्जीत संयतो रागद्वेषा-8 सूत्रम् वपाकृत्येति सूत्रार्थः // 83 // तत्थ त्ति सूत्रम्, तत्र कोष्ठकादौ से तस्य साधो(ञानस्य अस्थि कण्टको वा स्यात्, कथंचिगृहिणां 87-96 वसतिप्रमाददोषात्, कारणगृहीते पुद्गल एवेत्यन्ये, तृणकाष्ठशर्करादि चापि स्यात्, उचितभोजनेऽन्यद्वापि तथाविधं बदरकर्कटकादीति मधिकृत्य सूत्रार्थः॥ 84 // तं उक्खिवित्तु इति सूत्रम्, तद् अस्थ्यादि उत्क्षिप्य हस्तेन यत्र क्वचिन्न निक्षिपेत्, तथा आस्येन मुखेन नोज्झेत्, |भोजनविधिः। मा भूद्विराधनेति, अपितु हस्तेन गृहीत्वा तद् अस्थ्यादि एकान्तमवक्रामेदिति सूत्रार्थः॥ 85 // एगंत त्ति सूत्रम्, एकान्तमवक्रम्य अचित्तं प्रत्युपेक्ष्य यतं प्रतिष्ठापयेत्, प्रतिष्ठाप्य प्रतिक्रामेदिति, भावार्थः पूर्ववदेवेति सूत्रार्थः / / 86 // सिआय भिक्खूइच्छिज्जा, सिज्जमागम्म भुत्तु। सपिंडपायमागम्म, उंडुअंपडिलेहिआ॥सूत्रम् 87 // विणएणं पविसित्ता, सगासे गुरुणो मुणी। इरियावहियमायाय, आगओ अपडिक्कमे।सूत्रम् 88 // आभोइत्ताण नीसेसं, अईआरंजहक्कम / गमणागमणे चेव, भत्तपाणे व संजए। सूत्रम् 89 // उजुप्पन्नो अणुव्विग्गो, अव्वक्खित्तेण चेअसा। आलोए गुरुसगासे, जंजहा गहिअंभवे / / सूत्रम् 90 / / नसम्ममालोइअंहुज्जा, पुव्विं पच्छा वजंकडं। पुणो पडिक्कमे तस्स, वोसट्ठो चिंतए इमं॥सूत्रम् 91 // अहो जिणेहिं असावज्जा, वित्ती साहूण देसिआ। मुक्खसाहणहेउस्स, साहुदेहस्स धारणा॥ सूत्रम् 12 // णमुक्कारेण पारित्ता, करित्ता जिणसंथवं / सज्झायं पट्टवित्ता णं, वीसमेज खणं मुणी॥ सूत्रम् 13 // 28