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________________ श्रीदशवैकालिकं श्रीहारि० वृत्तियुतम् // 250 // बुद्ध्यते कल्याणं कल्यो- मोक्षस्तमणति- प्रापयतीति कल्याणं- दयाख्यं संयमस्वरूपम्, तथा श्रुत्वा जानाति पापकंअसंयमस्वरूपम्, उभयमपि संयमासंयमस्वरूपं श्रावकोपयोगि जानाति श्रुत्वा, नाश्रुत्वा, यतश्चैवमत इत्थं विज्ञाय यत् छेकं- षड्जीव निकायम्, निपुणं हितं कालोचितं तत्समाचरेत्कुर्यादित्यर्थः॥११॥ उक्तमेवार्थं स्पष्टयन्नाह- जो जीवेऽवि इत्यादि, यो 'जीवानपि' सूत्रगाथा पृथिवीकायिकादिभेदभिन्नान् न जानाति अजीवानपि संयमोपघातिनो मद्यहिरण्यादीन्न जानाति, जीवाजीवानजानन्कथमसौ |14-25 ज्ञास्यति संयमं? तद्विषयम्, तद्विषयाज्ञानादिति भावः // 12 // ततश्च यो जीवानपि जानात्यजीवानपि जानाति जीवाजीवान् / जीवाजीवादि ज्ञानेन विजानन् स एव ज्ञास्यति संयममिति / प्रतिपादितः पञ्चम उपदेशार्थाधिकारः॥१३॥ मोक्षप्राप्तिः। जया जीवमजीवे अ, दोऽवि एए वियाणइ। तया गइंबहुविहं, सव्वजीवाण जाणइ // 14 // जया गई बहुविहं, सव्वजीवाण जाणइ / तया पुण्णं च पावं च, बंधं मुक्खं च जाणइ॥१५॥ जया पुण्णं च पावंच, बंधं मुक्खं च जाणइ / तया निव्विंदए भोए, जे दिव्वे जे अमाणुसे // 16 // जया निव्विंदए भोगे,जे दिव्वे जे अमाणुसे। तया चयइ संजोगं, सब्भिंतरबाहिरं॥१७॥ जया चयइ संजोगं, सब्भिंतरबाहिरं। तया मुंडे भवित्ताणं, पव्वइए अणगारिअं॥१८॥ जया मुंडे भवित्ता णं, पव्वइए अणगारिआतया संवरमुक्किटुं, धम्मं फासे अणुत्तरं / / 19 / / जया संवरमुक्किट्ठ, धम्मं फासे अणुत्तरं / तया धुणइ कम्मरयं, अबोहिकलुसं कडं // 20 // // 250 // जया धुणइ कम्मरयं, अबोहिकलुसंकडं। तया सव्वत्तगं नाणं, दंसणं चाभिगच्छइ // 21 // जया सव्वत्तगं नाणं, दंसणं चाभिगच्छइ। तया लोगमलोगंच, जिणो जाणइ केवली / / 22 //
SR No.600441
Book TitleDashvaikalik Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyakiritivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages466
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_dashvaikalik
File Size34 MB
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