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________________ श्रीसमवायाङ्गं श्रीअभय० वृत्तियुतम् // 247 // सूत्रम् 152 शरीरावधिवेदनालेश्याऽऽहारसूत्रम् तच्छरीराणामवगाहनाप्रतिपादनायाह कति णं भंते! सरीरा प०?, गोयमा! पंच सरीरा प०, तं०-ओरालिए वेउव्विए आहारए तेयए कम्मए, ओरालियसरीरे णं भंते कइविहे प०?, गोयमा! पंचविहे प०, तं०- एगिदियओरालियसरीरे जाव गन्भवक्वंतियमणुस्सपंचिंदियओरालियसरीरे य, ओरालियसरीरस्सणं भंते! के महालिया सरीरोगाहणा पन्नत्ता?,गोयमा! जहन्नेणं अंगुलअसंखेजतिभागं उक्कोसेणं साइरेगंजोयणसहस्सं, एवं जहा ओगाहणसंठाणे ओरालियपमाणं तहा निरवसेसं, एवं जाव मणुस्सेत्ति उक्कोसेणं तिण्णि गाउयाई। कइविहे णं भंते! वेउब्वियसरीरे प०?, गोयमा दुविहे प० एगिदियवेउव्वियसरीरे य पंचिंदियवेउव्वियसरीरे अ, एवं जाव सणंकुमारे आढत्तं जाव अणुत्तराणं भवधारणिज्जा जा तेसिं रयणी रयणी परिहायइ / आहारयसरीरेणं भंते! कइविहे पन्नत्ते?, गोयमा! एगाकारे प०, जइ एगाकारे प० किं मणुस्सआहारयसरीरे अमणुस्सआहारयसरीरे?, गोयमा! मणुस्सआहारगसरीरे णो अमणुस्सआहारगसरीरे, एवं जई मणुस्सआहारगसरीरे किंगन्भवक्वंतियमणुस्सआहारगसरीरे संमुच्छिममणुस्सआहारगसरीरे?, गोयमा! गम्भवक्कंतियमणुस्सआहारयसरीरेनोसंमुच्छिममणुस्सआहारयसरीरे, जइगन्भवक्कंतिय० किं कम्मभूमिगा० अकम्मभूमिगा०?, गोयमा! कम्मभूमिगा० नो अकम्मभूमिगा०, जइ कम्मभूमिगा किं संखेजावासाउय० असंखेजवासाउय०?, गोयमा! संखेजावासाउय० नो असंखेज्जावासाउय०, जइ संखेजवासाउय० किं पज्जत्तय० अपज्जत्तय०?, गोयमा! पज्जत्तय० नो अपजतय०, जइ पज्जत्तय किंसम्मद्दिट्ठी०मिच्छदिट्ठी० सम्मामिच्छदिट्ठी०?,गोयमा! सम्मदिट्ठी० नो मिच्छदिट्ठी नोसम्मामिच्छदिट्ठी, जइसम्मदिट्ठी० किं संजय० असंजय० संजयासंजय०?, गोयमा! संजय० नो असंजय० नो संजयासंजय०, जइ संजय० किं पमत्तसंजय० अपम्मत्तसंजय०?, गोयमा! पमत्तसंजय० नो अपमत्तसंजय०,जइ पमत्तसंजय० किं इहिपत्त० अणिहिपत्त०?, गोयमा! इडिपत्त० नो अणिविपत्त० वयणा // 247 //
SR No.600440
Book TitleSamvayang Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyakiritivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages300
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_samvayang
File Size20 MB
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